नई दिल्ली/लखनऊ। उत्तर प्रदेश के करीब 1.86 लाख शिक्षकों की शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से छूट मिलने की उम्मीदों पर आखिरकार मोदी सरकार ने पूरी तरह से विराम लगा दिया है। संसद के भीतर सरकार ने साफ शब्दों में इस बात का ऐलान कर दिया कि पुराने शिक्षक हों या नए, TET से किसी को भी छूट नहीं मिलेगी।
लोकसभा में केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने स्पष्ट कर दिया कि यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़ा है। इसलिए केंद्र सरकार न तो RTE (शिक्षा का अधिकार) अधिनियम, 2009 की धारा-23 में संशोधन करने जा रही है और न ही पुराने शिक्षकों को किसी प्रकार की विशेष राहत देने पर विचार कर रही है। इस बयान के साथ ही वर्षों से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हजारों शिक्षकों की उम्मीदों पर पानी फिर गया।
संसद में उठा सवाल तो सरकार ने दिया जवाब
लोकसभा में कर्नाटक के सांसद ई. तुकाराम ने सरकार से पूछा कि क्या TET लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों पर इसके प्रभाव का अध्ययन किया गया है? क्या ऐसे शिक्षकों को राहत देने के लिए RTE अधिनियम की धारा-23 में संशोधन पर विचार किया जा रहा है? क्या सरकार अंतरिम राहत देने की योजना बना रही है?
इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी ने कहा कि शिक्षकों की नियुक्ति और सेवा शर्तें राज्यों का विषय हैं, इसलिए ऐसे शिक्षकों का पूरा रिकॉर्ड राज्य सरकारों के पास है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा था कि TET, RTE अधिनियम की धारा-23 के तहत निर्धारित न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता है। इसलिए RTE के दायरे में आने वाले सभी स्कूलों में शिक्षक बनने के लिए TET अनिवार्य रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 29 मई 2026 को एक राहत जरूर दी थी। अदालत ने TET पास करने की अंतिम समय-सीमा 31 अगस्त 2027 से बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी। यानी अदालत ने नियम में कोई बदलाव नहीं किया, बल्कि शिक्षकों को योग्यता पूरी करने के लिए सिर्फ एक अतिरिक्त वर्ष दिया।
राज्यों को हर साल दो बार TET कराने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में राज्यों और संबंधित परीक्षा प्राधिकरणों को भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि हर वर्ष कम से कम दो बार TET आयोजित करने का प्रयास किया जाए। दोनों परीक्षाओं के बीच लगभग छह महीने का अंतर होना चाहिए, ताकि शिक्षकों को पात्रता हासिल करने के पर्याप्त अवसर मिल सकें। इस आदेश के बाद उत्तर प्रदेश समेत सभी राज्यों पर नियमित रूप से TET आयोजित करने का दबाव बढ़ गया है। यूपी में हाल ही में जुलाई में TET आयोजित हुई थी। ऐसे में अब अगले चक्र के तहत जनवरी 2027 में भी परीक्षा आयोजित किए जाने की उम्मीद है।
यूपी के 1.86 लाख शिक्षक सीधे प्रभावित
बेसिक शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में करीब 1.86 लाख शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने अब तक TET उत्तीर्ण नहीं किया है। इनमें बड़ी संख्या उन शिक्षकों की है, जिनकी नियुक्ति TET व्यवस्था लागू होने से पहले हुई थी। प्रभावित शिक्षकों में सहायक अध्यापक, शिक्षा मित्र से समायोजित शिक्षक, पुराने प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षक और दूरस्थ क्षेत्रों में वर्षों से कार्यरत शिक्षक शामिल हैं। इन शिक्षकों का तर्क है कि RTE कानून 2009 में बना और उत्तर प्रदेश में 2011 से लागू हुआ, इसलिए इससे पहले नियुक्त शिक्षकों पर बाद में लागू हुए नियमों को लागू करना न्यायसंगत नहीं है।
अनुभव के आधार पर छूट की मांग भी खारिज
शिक्षक संगठनों की मांग थी कि लंबे अनुभव वाले शिक्षकों, विशेषकर सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच चुके कर्मचारियों को TET से छूट दी जाए। उनका कहना था कि दशकों के शिक्षण अनुभव को भी पात्रता का आधार माना जाना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद RTE अधिनियम में संशोधन कर ऐसी कोई राहत देना संभव नहीं है। सरकार ने साफ संकेत दिया कि इस मुद्दे पर उसका रुख बदलने वाला नहीं है।
अब आगे क्या होगा?
अब उत्तर प्रदेश सरकार के सामने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा। सरकार को नियमित अंतराल पर TET आयोजित करनी होगी और सभी पात्र शिक्षकों को परीक्षा में शामिल होने का अवसर देना होगा। साथ ही 31 अगस्त 2028 तक सभी संबंधित शिक्षकों को TET उत्तीर्ण करना होगा। निर्धारित समय-सीमा तक योग्यता पूरी नहीं करने वाले शिक्षकों की सेवा पर संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे शिक्षकों को न केवल सेवा संबंधी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, बल्कि पदोन्नति (प्रमोशन) का लाभ भी नहीं मिलेगा। कुल मिलाकर संसद में केंद्र सरकार के ताजा बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि TET अब केवल एक औपचारिक परीक्षा नहीं, बल्कि शिक्षक की नौकरी और भविष्य से जुड़ी अनिवार्य शर्त बन चुकी है।




