नक्सलवाद पर कड़ा प्रहार, विकास की राह पर तेजी से बढ़ता भारत

सत्य प्रकाश

आगामी 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की प्रतिबद्धता पर तत्परता और समर्पण के साथ जुटते हुए हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में सर्वांगीण विकास के लिए मोदी सरकार सशक्त, सुरक्षित और समृद्ध भारत का निर्माण कर रही है। सुरक्षा बलों के अथक प्रयासों, सटीक रणनीति और जवानों के असाधारण साहस से वामपंथी उग्रवाद से सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 12 से घटकर सिर्फ छह रह गयी है।

नक्सलवाद से कुल प्रभावित जिलों में छत्तीसगढ़ के चार जिले बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा, झारखंड का एक पश्चिमी सिंहभूम और महाराष्ट्र का भी एक ज़िला गढ़चिरौली शामिल है। कुल 38 प्रभावित ज़िलों में से चिंताजनक जिलों में आंध्र प्रदेश का अल्लूरी सीताराम राजू, मध्य प्रदेश का बालाघाट, ओडिशा के कालाहांडी, कंधमाल और मलकानगिरि तथा तेलंगाना का भद्राद्रि-कोठागुडेम है। नक्सलवाद के खिलाफ लगातार कार्रवाई के कारण अन्य प्रभावित जिलों में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, गरियाबंद और मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, झारखंड का लातेहार, ओडिशा का नुआपाड़ा और तेलंगाना का मुलुगु शामिल हैं।

नक्सलवाद से अतिप्रभावित जिलों एवं चिंताजनक जिलों को केंद्र सरकार ‘विशेष केन्द्रीय सहायता’ योजना के तहत सार्वजनिक बुनियादी ढांचों में सुधार के लिए 30 करोड़ एवं 10 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता देती है और इसके अलावा इन जिलों के लिए आवश्यकतानुसार विशेष परियोजना का भी प्रावधान है। पिछले एक वर्ष में वामपंथी उग्रवाद परिदृश्य में तीव्र गति से हुए उल्लेखनीय सुधार का प्रमुख कारण उग्रवाद प्रभावित मुख्य क्षेत्रों में नये सुरक्षा शिविरों की स्थापना एवं विकासोन्मुखी कार्यों जैसे सड़कों का विस्तार, परिवहन की सुविधा, पानी, बिजली एवं शासन की अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं की ग्रामीणों तक पहुंच बढ़ना है।

नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों का उल्लेख करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र का बच्चा जब हाथ में बंदूक की जगह पेंसिल पकड़ता है तो न सिर्फ एक क्षेत्र बल्कि पूरे देश का भविष्य संवरता है। पूरा क्षेत्र राष्ट्र के मुख्यधारा से जुड़ जाता है। वास्तव में नक्सली हिंसा गरीबों और आदिवासियों के लिए बहुत बड़ी विभीषिका रही है, इसलिए जिस क्षेत्र से नक्सलवाद ख़त्म हो रहा है, वहां सरकार अनाज, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, घर और पीने का शुद्ध पानी पहुंचाकर लाल आतंक का समूल नाश कर रही है।

केंद्रीय गृहमंत्री क्षेत्र में हिंसा और विकास का जायजा लेने के लिए अक्सर संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री, सुरक्षा एजेंसी के प्रमुख और स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों से चर्चा करते हैं। इससे न सिर्फ विकास कार्यों का समन्वय होता है बल्कि आम जनता में भी सरकार की प्रति भरोसा बढ़ता है। सुरक्षा बलों के जवानों का मनोबल उच्च रहता है। सुरक्षा बलों की हौसला अफजाई करते हुए शाह का कहना है, “सुरक्षा बलों ने जिस शौर्य, धैर्य और समर्पण के साथ माओवादियों के अड्डों को तहस-नहस किया है, उसने दुनिया के सभी सुरक्षा बलों को आश्चर्यचकित कर दिया है। सुरक्षा बलों के इसी भरोसे से मैं देश में 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे का ऐलान करता हूं।”

नक्सलवाद से पिछले 35 साल में लगभग 40 हजार लोगों की मौत हुई है या फिर वे अपाहिज होकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। नक्सलवादी हिंसा ने गरीब आदिवासी तक खाना, बिजली, शिक्षा, घर, शौचालय और पीने का शुद्ध पानी जैसे मूलभूत सुविधाओं को नहीं पहुंचने दिया और उद्योग भी नहीं पनप पाये। इसके कारण स्वतंत्रता के बाद भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र अभावों से जूझते रहे।

सरकार नक्सलवादियों के प्रति कड़ाई बरत रही है तो क्षेत्र के युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसरों का भी सृजन किया जा रहा है। नक्सलवाद के रास्ते पर भटके सभी युवाओं से हथियार डालकर राज्य सरकार की आत्मसमर्पण नीति का लाभ उठाने की अपील की गयी है। सरकार का कहना है कि हिंसा के रास्ते पर चल रहे युवा भरोसा करें और समाज की मुख्यधारा में शामिल हों। इस तरह वे अपने आप देश की विकास यात्रा के साथ जुड़ जाएंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सली हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में विकास की पिछड़ी स्थिति को स्वीकार करते हुए कहा है कि यह सच है कि माओवादी हिंसा ने मध्य और पूर्वी भारत के कई जिलों की प्रगति को रोक दिया था। इसीलिए वर्ष 2015 में सरकार ने माओवादी हिंसा को खत्म करने के लिए एक व्यापक ‘राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना’ तैयार की। हिंसा के प्रति शून्य सहिष्णुता के साथ-साथ हमने इन क्षेत्रों में गरीब लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए बुनियादी ढांचे और सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने पर भी ध्यान केन्‍द्रित किया है।

वामपंथी उग्रवाद या नक्सलवाद भारत की सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में से एक है। सामाजिक-आर्थिक असमानताओं में मजबूती से समाये और माओवादी विचारधारा से प्रेरित नक्सलवाद ने ऐतिहासिक रूप से देश के कुछ सुदूरवर्ती, अविकसित और आदिवासी-बहुल क्षेत्रों को प्रभावित किया है। इसका उद्देश्य सशस्त्र विद्रोह और समानांतर शासन व्यवस्था से भारत को कमजोर करना है। इनकी मुख्य रणनीति सुरक्षा बलों, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और लोकतांत्रिक संस्थानों को निशाना बनाना है। पश्चिम बंगाल में वर्ष 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से आरंभ होकर यह मुख्य रूप से “रेड कॉरिडोर” में फैल गया जिसने छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को प्रभावित किया।

वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या अप्रैल 2018 में 126 से घटकर 90, जुलाई 2021 में 70 और अप्रैल-2024 में 38 हो गई। पिछले 10 वर्षों में 8,000 से अधिक नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है। वामपंथी उग्रवाद की हिंसा की घटनाएं जो वर्ष 2010 में अपने उच्चतम स्तर 1936 पर पहुंच गई थीं, 2024 में घटकर 374 रह गई हैं और इनमें 81 प्रतिशत की कमी‌ दर्ज की गयी। इस अवधि के दौरान कुल मौतों, नागरिकों और सुरक्षा बलों के जवानों की संख्या भी 85 प्रतिशत घटकर वर्ष 2010 में 1005 से वर्ष 2024 में 150 रह गयी है।

केंद्र सरकार ने वामपंथी उग्रवाद के प्रति शून्य सहनशीलता का दृष्टिकोण अपनाया है और सरकारी योजनाओं के 100 प्रतिशत कार्यान्‍वयन के साथ वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों का पूर्ण विकास करना चाहती है। वामपंथी उग्रवाद से लड़ने के लिए सरकार ने दो नियम बनाए हैं। पहला, नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में कानून का राज स्थापित करना और गैरकानूनी हिंसक गतिविधियों को पूरी तरह से रोकना। दूसरा, उन क्षेत्रों राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल करना जो लंबे समय तक चले नक्‍सली हिंसा के कारण विकास से वंचित रहे। वामपंथी उग्रवाद की समस्या से समग्र रूप से निपटने के लिए वर्ष 2015 में एक राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना को मंजूरी दी गई थी। इसमें सुरक्षा संबंधी उपायों, विकास कार्यों, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और हकों को सुनिश्चित करने आदि से संबंधित एक बहुआयामी रणनीति की तैयार की गयी है।

प्रमुख विकास योजनाओं के अलावा केंद्र सरकार ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों में कई विशिष्ट पहल की हैं, जिसमें सड़क नेटवर्क के विस्तार, दूरसंचार संपर्क में सुधार, कौशल और वित्तीय समावेशन पर विशेष जोर दिया गया है। सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई) योजन के तहत, केन्‍द्र सरकार वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों और निगरानी के लिए निर्धारित जिलों के लिए सुरक्षा संबंधी व्यय की प्रतिपूर्ति करती है। प्रतिपूर्ति में सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण और परिचालन संबंधी आवश्यकताओं, वामपंथी उग्रवाद हिंसा में मारे गए या घायल हुए नागरिकों और सुरक्षा बलों के परिवारों को अनुग्रह राशि का भुगतान, आत्मसमर्पण करने वाले वामपंथी उग्रवादियों के पुनर्वास, सामुदायिक पुलिसिंग, ग्राम रक्षा समितियां और प्रचार सामग्री से संबंधित व्यय शामिल हैं।

इस योजना का उद्देश्य वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों की क्षमता को मजबूत करना है ताकि वे वामपंथी उग्रवाद की समस्या से प्रभावी ढंग से लड़ सकें। वर्ष 2014-15 से 2024-25 के दौरान इस योजना के तहत 3260.37 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। वामपंथी उग्रवाद से सबसे अधिक प्रभावित जिलों के लिए विशेष केन्‍द्रीय सहायता योजना को वर्ष 2017 में मंजूरी दी गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य वामपंथी उग्रवाद से सबसे अधिक प्रभावित जिलों में सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और सेवाओं में सुधार करना है। योजना की शुरुआत के बाद से अब तक 3,563 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।

विशेष अवसंरचना योजना के तहत राज्य खुफिया शाखाओं, विशेष बलों, जिला पुलिस और फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों को मजबूत करने के लिए धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। इसके लिए 1741 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। इस योजना के तहत 221 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों का निर्माण किया गया है। फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों की योजना के तहत 10 वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों में 400 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं।

पिछले 10 वर्षों में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में कुल 612 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं। वर्ष 2014 में केवल 66 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन थे। एक अन्य योजना के तहत, वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में तैनात सीएपीएफ को स्थानीय लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न नागरिक गतिविधियों के संचालन के लिए धनराशि जारी की जाती है। वर्ष 2014-15 से सीएपीएफ को 196.23 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क संपर्क परियोजना लागू कर‌ रहा है। आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में सड़क संपर्क में सुधार किया जा रहा है। वर्ष 2016 में 44 सबसे अधिक प्रभावित वामपंथी उग्रवाद जिलों और नौ राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश के कुछ आसपास के जिलों में सड़क संपर्क में सुधार के लिए शुरू की गई थी। इस योजना के उद्देश्य सुरक्षा बलों द्वारा वामपंथी उग्रवाद विरोधी अभियानों को सुचारू और निर्बाध रूप से चलाना और साथ ही क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक विकास सुनिश्चित करना है। संबंधित योजनाओं के तहत 17,589 किलोमीटर सड़कें मंजूर की गई हैं। इनमें से 14,618 किलोमीटर का निर्माण हो चुका है।

नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में दूरसंचार संपर्क पर विशेष जोर दिया गया है। कुल 10,505 मोबाइल टावरों की योजना बनाई गई है, जिनमें से 7,768 टावर चालू हो चुके हैं। एक दिसम्‍बर, 2025 तक पूरा नक्सल प्रभावित क्षेत्र मोबाइल संपर्क से लैस हो जाएगा। गृह मंत्रालय को 35 वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में आकांक्षी जिला कार्यक्रम की निगरानी का कार्य सौंपा गया है। इन क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के वित्तीय समावेशन के लिए, अप्रैल 2015 से 30 सर्वाधिक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में 1,007 बैंक शाखाएं और 937 एटीएम तथा वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में 5,731 नए डाकघर खोले गए हैं। सर्वाधिक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में 37,850 बैंकिंग संस्‍थाएं चालू की गई हैं।

कौशल विकास के लिए वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में 48 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान और 61 कौशल विकास केन्‍द्र संचालित किए गए हैं। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों के आदिवासी ब्लॉकों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए 178 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय चल रहे हैं। कौशल विकास योजना सभी 48 जिलों तक पहुंच गई है और राष्ट्रीय जांच एजेंसी का एक मजबूत ढांचा बनाया गया है। कुल 1,143 आदिवासी युवाओं को सुरक्षा बलों में भर्ती किया गया है।

वर्ष 2019 से सुरक्षा संबंधी रिक्तियों को भरने के लिए 280 नए शिविर स्थापित किए गए हैं, 15 नए संयुक्त कार्य बल बनाए गए हैं तथा विभिन्न राज्यों में राज्य पुलिस की सहायता के लिए छह सीआरपीएफ बटालियनों को तैनात किया गया है। इसके साथ ही, नक्सलियों के वित्तपोषण को रोकने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सक्रिय करके एक आक्रामक रणनीति अपनाई गई है, जिसके परिणामस्वरूप उनके लिए वित्तीय संसाधनों की कमी हो गई है। कई लंबी अवधि के अभियान चलाए गए, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि नक्सलियों को घेर लिया जाए, ताकि उन्हें भागने का कोई मौका नहीं मिले।

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने दो अक्टूबर, 2024 को झारखंड से ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ की शुरुआत की। यह अभियान 15,000 से अधिक गांवों में ग्रामीण क्षेत्रों में पूर्ण संतृप्ति प्राप्त करने के लिए व्यक्तिगत सुविधाएं प्रदान करने में एक महत्‍वपूर्ण उपलब्धि होगी, जिससे वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में लगभग 1.5 करोड़ लोगों को लाभ होगा। सरकार वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में 3-सी यानी सड़क संपर्क, मोबाइल संपर्क और वित्तीय संपर्क को मजबूत कर रही है। बीते 30 वर्षों में पहली बार, 2022 में वामपंथी उग्रवाद के कारण हताहतों की संख्या 100 से कम थी, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वर्ष 2014 से 2024 तक नक्सली घटनाओं में काफी कमी आई है। 15 शीर्ष नक्सल नेताओं को निष्‍प्रभावी कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ में सरकारी बुद्ध पहाड़ और चकरबंधा जैसे क्षेत्र नक्सलवाद की पकड़ से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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