संसद का मानसून सत्र सोमवार यानी 21 जुलाई 2025 से शुरू हो रहा है। इसमें ऑपरेशन सिंदूर, भारत-पाकिस्तान संघर्ष विराम, डोनाल्ड ट्रम्प के सीजफायर पर दावे और बिहार वोटर लिस्ट जैसे मुद्दों पर हंगामा होने के आसार हैं। विपक्ष इन सभी मुद्दों पर पीएम नरेंद्र मोदी से जवाब चाहेगा और सरकार इन सवालों के जवाब देने से बचने की पूरी कोशिश करेगा।
सत्र की पूर्व संध्या पर जिस तरह से राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़ हुई है, उससे स्पष्ट है कि संसद का यह सत्र सिर्फ विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मंच बनेगा जहां राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, घरेलू प्रशासन और चुनावी प्रक्रिया पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
20 जुलाई को हुई सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने की रणनीति साफ़ कर दी है। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने ऑपरेशन सिंदूर, भारत-पाकिस्तान सीमा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन, डोनाल्ड ट्रम्प के विवादित दावों और बिहार में वोटर लिस्ट की समीक्षा जैसे मुद्दों को सत्र के दौरान उठाने की बात कही है।
ये सभी मुद्दे सीधे तौर पर देश की सुरक्षा, संप्रभुता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े हैं। विपक्ष का तर्क है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इन संवेदनशील विषयों पर खुद संसद में बयान देना चाहिए। निश्चित रूप से ये मांगें सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने या उसे घेरने की रणनीति का हिस्सा है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के एक बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा रखी है। ट्रम्प ने अब तक 24 दफे इस बात का दावा किया कि भारत द्वारा पाकिस्तान पर किए गए एक विशेष ऑपरेशन (जिसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ बताया जा रहा है) में अमेरिका ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। ट्रम्प का साफतौर पर कहना है कि उसने भारत और पाकिस्तान को समझा-बुझाकर सीजफायर कराया था।
यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, सैन्य गोपनीयता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों से जुड़ा हुआ है। यदि वास्तव में कोई संयुक्त अभियान हुआ है तो उसके खुलासे के क्या परिणाम हो सकते हैं? क्या सरकार ने संसद को विश्वास में लिया? क्या यह दावा भारत की सुरक्षा नीति की पारदर्शिता पर सवाल नहीं खड़े करता? भारत-पाकिस्तान के बीच तीसरे पक्ष की भूमिका को स्वीकार किया जाना चाहिए?
सरकार ने फिलहाल इस पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है, लेकिन संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भरोसा दिलाया कि सरकार सदन में इन विषयों पर स्पष्टीकरण देगी।
मालूम हो कि साल 2021 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम का एक समझौता हुआ था, जिसे दोनों देशों ने Back Channel Diplomacy के तहत सुलझाया था। यह एक प्रकार की गोपनीय और अनौपचारिक कूटनीतिक प्रक्रिया होती है, जिसमें दो देशों या पक्षों के बीच बातचीत औपचारिक राजनयिक चैनलों के बाहर की जाती है। इसका उद्देश्य संवेदनशील या विवादित मुद्दों पर बातचीत करना होता है ताकि बिना सार्वजनिक दबाव के समाधान निकाला जा सके।
भारत-पाकिस्तान के बीच Back Channel Diplomacy का सबसे चर्चित उदाहरण है 2021 का संघर्ष विराम समझौता। तब दोनों देशों ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि वे सीमा पर फायरिंग बंद करेंगे। यह खुफिया अधिकारियों और विशेष दूतों के बीच गुप्त बातचीत होती है जिसका बाद में खुलासा किया जाता है।
विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने में विफल रही है। ऐसे में संसद में यह बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है, जहां विपक्ष सरकार से कठोर सवाल पूछेगा कि क्या संघर्ष विराम केवल कागज़ पर रह गया है? क्या खुफिया एजेंसियां और रक्षा मंत्रालय सतर्क हैं?
बिहार में चुनाव से ठीक पहले विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं जिससे गरीब, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को उनका वोट देने का अधिकार प्रभावित होगा।
इस मुद्दे को उठाकर विपक्ष केंद्र सरकार पर चुनावी हेरफेर का आरोप लगाने की तैयारी में है। यह चुनावी निष्पक्षता और लोकतंत्र की पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मामला है। संसद में यह बहस न सिर्फ बिहार तक सीमित रहेगी, बल्कि पूरे देश के चुनावी सिस्टम पर असर डालेगी।
सत्र शुरू होने से पहले उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सभी दलों से सौहार्द बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा, “हमारे विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन दिलों में कड़वाहट नहीं होनी चाहिए।” यह बयान एक महत्वपूर्ण संकेत है कि सत्र में भावनात्मक मुद्दे हावी हो सकते हैं, लेकिन उनका समाधान विचारों की टकराहट से नहीं, संवाद और सहमति से ही संभव है।
क्या हंगामे में दब जाएंगे ये अहम बिल?
मॉनसून सत्र हो या कोई और सत्र, उसका मुख्य उद्देश्य विधायी कामकाज होता है, और इस बार भी केंद्र सरकार 8 नए विधेयक लाने जा रही है। इनमें टैक्सेशन लॉ संशोधन बिल 2025 प्रमुख है जो जो 1961 के टैक्स कानून को रिप्लेस करेगा। इसके अलावा मणिपुर जीएसटी संशोधन बिल 2025, जन विश्वास संशोधन बिल 2025, भारतीय प्रबंधन संस्थान संशोधन बिल 2025, नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस बिल 2025, भू-विरासत स्थल और भू-अवशेष (संरक्षण और रखरखाव) बिल 2025, खान और खणिज (विकास और विनियमन) बिल 2025 और नेशनल एंटी-डोपिंग सशोधन बिल 2025 हैं।
इनके अलावा 7 लंबित बिल (इनकट टैक्स बिल 2025, इंडियन पोर्ट्स बिल 2025, मर्चेंट शिपिंग बिल 2024, कोस्टल शिपिंग बिल 2024, समुद्र माल परिहवहन बिल 2024, बिल ऑफ लैंडिंग बिल 2024 और गोवा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व का पुनर्समायोजन बिल 2024) भी हैं, जिन पर चर्चा अपेक्षित है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर विपक्ष लगातार हंगामा करता रहा, तो क्या ये बिल पास हो पाएंगे?
पूर्व सत्रों का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि हंगामे की स्थिति में विधायी कामकाज बुरी तरह प्रभावित होता है। इससे न सिर्फ सरकार को नुकसान होता है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी ठेस पहुंचती है।
सत्तापक्ष की रणनीति साफ़ है- बिल पास कराना, बहस की अनुमति देना, लेकिन मुद्दों को भटकाने से रोकना। वहीं विपक्ष इन संवेदनशील मुद्दों के जरिए सरकार को “डिफेंसिव मोड” में लाना चाहेगा।
इसके पीछे आने वाले राज्यों के चुनाव (खासतौर पर बिहार और बंगाल विधानसभा चुनाव) की तैयारियां भी हैं। संसद का यह सत्र निश्चित रूप से अगले चुनावी नैरेटिव की नींव रख सकता है खासकर यदि सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही दिखाती है, या विपक्ष इसे मुद्दों से भटकाने का आरोप लगाता है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या संसद अपनी गरिमा बचा पाएगी? सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है कि संसद चलेगी या नहीं, सवाल यह भी है कि क्या यह सार्थक रूप से चलेगी? क्या विपक्ष केवल हंगामे तक सीमित रहेगा या वैकल्पिक दृष्टिकोण भी देगा? क्या सरकार विपक्ष के सवालों का जवाब देगी या उन्हें ‘देश विरोधी’ करार देकर किनारे करेगी? आने वाले 32 दिनों में इन तमाम सवालों के जवाब मिलेंगे।




