नई दिल्ली। देश की सियासत में इस वक्त ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा काफी चर्चा में है। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच डिप्टी सीएम अजित पवार के एक विवादित बयान से महायुति में घमासान मच गया है।
अजित पवार ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक तरह से चुनौती देते हुए कहा कि ‘बटेंगे तो कटेंगे का नारा उत्तर प्रदेश और झारखंड में चलता होगा, महाराष्ट्र में नहीं चलेगा। मैं इसका समर्थन नहीं करता। हमारा नारा है- सबका साथ सबका विकास।’
अब सवाल ये उठता है कि जिस नारे को बीजेपी के स्टार प्रचारक पीएम मोदी और यूपी के सीएम योगी समेत तमाम नेता मास्टरस्ट्रोक की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने इसका खुला विरोध क्यों कर दिया है?
दरअसल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ झारखंड और महाराष्ट्र की चुनावी रैलियों में ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ और ‘एक रहेंगे तो नेक रहेंगे’ का नारा दे रहे हैं। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी चुनावी रैलियों में ‘एक रहेंगे सेफ रहेंगे’ का नारा देकर सीएम योगी के नारे पर मुहर लगा रहे हैं। आरएसएस के सह कार्यवाह दत्तात्रेय
अजित पवार ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा- ‘दूसरे राज्यों के भाजपा के मुख्यमंत्री तय करें कि उन्हें क्या बोलना है। महाराष्ट्र में बाहर के लोग आकर ऐसी बातें बोल जाते हैं। हम महायुति में एक साथ काम कर रहे हैं, लेकिन हमारी पार्टियों की विचारधारा अलग-अलग है। हो सकता है कि उनके राज्यों में यह सब चलता हो, लेकिन महाराष्ट्र में ये काम नहीं करता।’
अजित पवार के इस बयान पर महायुति में घमासान मच गया है। शिवसेना (शिंदे गुट) नेता संजय निरूपम ने अजित पवार पर पलटवार करते हुए कहा कि योगी आदित्यनाथ कह रहे हैं कि अगर आप बिखर जाते हैं, तो कमजोर हो जाते हैं। अगर आप एकजुट रहते हैं, तो मजबूत रहते हैं। अजित दादा आज भले ही नहीं समझ रहे हैं, पर आगे समझ जाएंगे। ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ ये लाइन बिल्कुल चलेगी। अजित दादा को समझना पड़ेगा।
बहरहाल, अजित पवार भले ही आज महायुति का हिस्सा हों और बीजेपी के साथ सरकार में जिम्मेदारी संभाल रहे हों, लेकिन उनकी सियासत की बुनियाद बीजेपी की विचारधारा से मेल तो नहीं ही खाती है। उन्होंने अपनी सियासी जमीन ‘गैरबराबरी’ की लड़ाई पर तैयार की है।
इसमें उन्होंने हिंदुत्व की इमेज का खुलकर इस्तेमाल नहीं किया है। अजित पवार की एनसीपी के समर्थकों में भी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की भागीदारी अच्छी खासी है, लिहाजा सीएम योगी के ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ वाले नारे से किनारा करना उनकी सियासी मजबूरी है।




