बिहार चुनाव 2025 : क्रांतिकारी राजनीतिक बदलाव की उम्मीद

सत्य प्रकाश

बिहार एक बार फिर ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता न सिर्फ सरकार तय करेगा, बल्कि राज्य की राजनीति की दशा और दिशा को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है। आगामी विधानसभा चुनाव केवल राजनीतिक दलों की ताकत का इम्तिहान भर नहीं हैं, बल्कि यह चुनाव एक “क्रांतिकारी बदलाव” का संकेतक भी बनने की तरफ अग्रसर है। इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि नेतृत्व, विचारधारा और जन अपेक्षाओं के नए अध्याय का उद्घाटन भी कर सकता है।

बीते तीन दशकों से बिहार की राजनीति जिन चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही उनमें लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, सुशील मोदी का नाम लिया जा सकता है। इनमें से राम विलास पासवान और सुशील मोदी दिवंगत हो चुके हैं और बचे लालू और नीतीश तो इन दोनों का दौर अब अंतिम मोड़ पर है। कहने का मतलब यह कि इन दोनों के लिए यह शायद आखिरी चुनाव हो।

इस परिदृश्य में राज्य की राजनीति में एक नवनेतृत्व का शून्य पैदा हुआ है। यही कारण है कि यह चुनाव ‘क्रांतिकारी’ माना जा रहा है- यह एक युग की समाप्ति और दूसरे युग की शुरुआत है। ऐसे में सवाल बड़ा स्वाभाविक सा है कि आखिर कौन भरेगा नेतृत्व का रिक्त स्थान? राजनीति में अगली कतार के रूप में तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, प्रशांत किशोर, सम्राट चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा जैसे नाम सामने आ रहे हैं। हालांकि ये सभी क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं, लेकिन अभी तक ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो पूरे राज्य का सर्वमान्य नेता बन सका हो, लालू और नीतीश की तरह। ऐसे में 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव तय करेगा कि क्या इनमें से कोई एक नेता राज्यव्यापी नेता के रूप में उभर सकेगा या फिर बिहार की राजनीति क्षेत्रीय और जातीय सीमाओं में ही बंटी रहेगी।

क्रांतिकारी क्यों है बिहार चुनाव 2025?
दरअसल, इस चुनाव को नेतृत्व का संक्रमण काल के तौर पर देखा जा रहा है। दशकों पुरानी राजनीतिक धारा समाप्त हो रही है। पहली बार बिहार में विकास, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे जातिगत राजनीति को चुनौती दे रहे हैं। पंचायत आरक्षण और बेरोज़गारी ने इन वर्गों को राजनीति में निर्णायक बनाया है। गठबंधन आधारित सत्ता संघर्ष में राष्ट्रीय पार्टियां भी स्थानीय दलों पर निर्भर दिख रही हैं। राजनीतिक विमर्श नए दृष्टिकोण और सोच की तलाश में है।

बिहार की राजनीति हमेशा जातीय समीकरणों से संचालित होती रही है। मंडल आयोग के बाद से पिछड़ा वर्ग की राजनीति ने खासा वर्चस्व पाया। आज भी जाति का प्रभाव मजबूत है, लेकिन अब उसमें विकास, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे सेंध लगा रहे हैं। वास्तव में, बिहार की जनता अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो समाज के हर वर्ग की आकांक्षाओं को स्वर दे सके न कि केवल जाति विशेष की।

पिछले एक दशक में बिहार की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। पंचायतों में 50% आरक्षण, महिला सशक्तिकरण योजनाएं और शिक्षा ने उन्हें निर्णयकारी भूमिका में ला खड़ा किया है। दूसरी ओर, युवा वर्ग जो बेरोजगारी और पलायन की पीड़ा झेल रहा है, अब राजनीति को केवल नारा नहीं, समाधान के रूप में देखना चाहता है।

वर्तमान विधानसभा और गठबंधन की स्थिति
243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में फिलहाल एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) सत्ता में है। इसमें भारतीय जनता पार्टी की 79 सीटें, जनता दल (यूनाइटेड) की 45 सीटें, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) की 4 सीटें, स्वतंत्र विधायक की 2 सीटें शामिल हैं। विपक्षी इंडिया गठबंधन की बात करें तो इसमें राष्ट्रीय जनता दल की 77 सीटें, कांग्रेस की 19 सीटें, भाकपा (माले) की 11 सीटें, माकपा की 2 सीटें, भाकपा की एक सीटें, एआईएमआईएम की 1 सीट और अन्य की एक सीट शामिल हैं। यह समीकरण बताता है कि मुकाबला बराबरी का है, लेकिन नेतृत्व और रणनीति की गुणवत्ता आगामी बिहार चुनाव की दिशा तय करेगी।

तो क्या बिहार लिखेगा नई राजनीतिक इबारत?
निश्चित रूप से बिहार का यह चुनाव जनता की परिपक्वता और राजनीतिक व्यवस्था की परीक्षा है। यह तय करेगा कि राज्य जातिगत राजनीति की पुनरावृत्ति करेगा या विकास आधारित समावेशी राजनीति की ओर बढ़ेगा। यदि मतदाता जाति और व्यक्ति केंद्रित राजनीति से ऊपर उठकर मुद्दों पर मतदान करते हैं तो यह चुनाव एक सच्ची लोकतांत्रिक क्रांति की शुरुआत होगा। यह क्रांति नेतृत्व, सोच और नीतियों के स्तर पर बिहार को एक नए युग में प्रवेश दिला सकती है।

कुल मिलाकर बिहार विधानसभा चुनाव-2025 महज एक राजनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक आंदोलन है। यह आंदोलन तय करेगा कि क्या बिहार जातिवाद की राजनीति से ऊपर उठेगा? क्या बिहार को ऐसा नेतृत्व मिलेगा जो पूरे प्रदेश की आवाज़ बन सके? क्या बिहार की जनता वाकई अपने मुद्दों पर वोट देगी या फिर परंपरा में उलझी रहेगी? कोई दो राय नहीं कि इस बार का चुनाव सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि युग परिवर्तन का प्रतीक बन सकता है। यदि मतदाता सजग रहे, तो यह चुनाव एक नये बिहार की नींव रख सकता है- एक ऐसा बिहार, जो सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक समृद्धि, नेतृत्व के साथ जवाबदेही और लोकतंत्र के साथ लोककल्याण को साथ लेकर चले।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
सत्ता विमर्श (Satta Vimarsh) नाम ही हमारी पहचान है। हमारा मानना है कि सब कुछ सत्ता के इर्द-गिर्द तय होता है, सरकार भी और सरोकार भी। लेकिन, इस सत्ता में हमारी-आपकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्ता में बैठे लोगों की। इसीलिए सत्ता और सरोकार से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जरूरी है।

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