नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस मदन भीमराव लोकुर का कहना है कि सेक्युलरिज्म यानि धर्मनिरपेक्षता संविधान का बुनियादी ढांचा है। इसे बदला नहीं जा सकता है। बाकी जिसको जो कहना है, वह कहने के लिए आजाद है। कोई भी कह सकता है कि यह हिंदू राष्ट्र है, कोई भी कह सकता है कि प्रधानमंत्री वास्तव में प्रेसिडेंट है। कहने में क्या है…।
याद हो तो ये वही जस्टिस लोकुर हैं जिन्होंने 12 जनवरी, 2018 की सुबह सुप्रीम कोर्ट के तीन अन्य जजों जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई के साथ जस्टिस चेलमेश्वर के आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इस प्रेस कांफ्रेंस में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट को ऑर्डर में नहीं लाया गया तो देश में लोकतंत्र नहीं बचेगा।
एक बार फिर दैनिक भास्कर से खास बातचीत में जस्टिस लोकुर ने भारत की मौजूदा न्यायपालिका और उससे जुड़े मुद्दों पर गंभीर बात कही है। जस्टिस लोकुर कहते हैं कि 2018 में हमने तब के सीजेआई को पत्र भी लिखा था। 7 साल बाद भी चुनौतियां बरकरार हैं। आज भी न्यायपालिका की आजादी खतरे में है। मास्टर ऑफ रोस्टर का मुद्दा जस का तस बना हुआ है।
पीएम नरेंद्र मोदी का पूर्व सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ के घर गणपति पूजा पर जाने को लेकर आपत्ति जताते हुए जस्टिस लोकुर ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री और सीजेआई का किसी ऑफिशियल फंक्शन में मिलना तो आम है। लोकपाल के चुनाव जैसे कई मौके आते हैं, जहां दोनों की मौजूदगी जरूरी है। बच्चों की शादी या घर में किसी के देहांत होने पर भी पीएम या जज किसी के घर जाते हैं। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन निजी फंक्शन में दोनों की मुलाकात ठीक नहीं है। हमारे देश में तो हर महीने कोई न कोई त्योहार आता है। ऐसे तो समस्या हो जाएगी। सभी जज निजी फंक्शन में चीफ मिनिस्टर या गवर्नर को अपने घर बुलाने लगेंगे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव ने विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में दिए वक्तव्य कि देश बहुमत के अनुसार चलेगा को भी जस्टिस लोकुर ने उचित नहीं कहा। उन्होंने कहा कि मैं जरूर पूछना चाहूंगा कि विश्व हिंदू परिषद का कार्यक्रम इलाहाबाद हाईकोर्ट के परिसर में क्यों हुआ? वहां पर कार्यक्रम नहीं होना चाहिए था। वह (जस्टिस शेखर यादव) जिस जगह बोल रहे थे, जिस कार्यक्रम में बोल रहे थे, उनके बयान का पूरा कॉन्टेक्स्ट देखेंगे तो पता चलता है कि इसका अच्छा मैसेज नहीं गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर आपत्ति जताई थी। जस्टिस शेखर यादव को बुलाया भी गया। बंद कमरे में क्या बातें हुईं, यह तो नहीं पता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को सोचने की जरूरत है कि ये सब क्यों हो रहा है।
पूर्व सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ द्वारा न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी हटवाने को लेकर जस्टिस लोकुर ने कहा कि डी. वाई. चंद्रचूड़ क्या संदेश देना चाहते थे, पता नहीं। न्याय की देवी की आंखों पर 150-200 सालों से पट्टी बंधी थी। इसके पीछे एक मैसेज था कि न्याय सभी के लिए बराबर है। फिर चाहे सामने कोई भी हो। हो सकता है कि पट्टी निकालने से आप देख पाएंगे कि कटघरे में बड़ा आदमी या पॉलिटिशियन है तो उसके फेवर में फैसला आने लगे।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक घोषित करना और SIT से जांच कराने की याचिका खारिज करने के सवाल पर जस्टिस लोकुर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस पर एक्शन लेना चाहिए था। कई शेल कंपनियों, घाटे में जा रही कंपनियों ने इलेक्टोरल बांड के जरिए राजनीति पार्टियों को चंदा दिया। कई कंपनियों ने 50 करोड़, 60 करोड़, 100 करोड़ के बॉन्ड खरीदे। जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलेक्टोरल बांड असंवैधानिक हैं तो उसे पूछना चाहिए था कि कंपनियों के पास इतने पैसे कहां से आए। कंपनियों ने राजनीतिक पार्टियों को पैसे क्यों दिए? क्या कंपनियों ने इस इनकम की घोषणा की थी? क्या आयकर विभाग ने जांच की थी या नहीं? माना कि कई कंपनियों ने इसलिए चंदा दिया होगा, क्योंकि वो किसी खास राजनीतिक पार्टी की विचारधारा को मानते होंगे, लेकिन उनका क्या, जिन्हें चंदा देने के बाद फायदा हुआ, कॉन्ट्रैक्ट मिला। ऐसे मामलों की जांच तो होनी चाहिए थी।
हिंदू राष्ट्र की मांग का संवैधानिक आधार क्या है, क्या यह संभव है? के सवाल पर जस्टिस लोकुर कहते हैं कि संविधान में साफ लिखा है कि हमारा देश सेक्युलर है। अगर कोई कह रहा है कि भारत हिंदू राष्ट्र होना चाहिए, तो यह उसकी विचारधारा है। संविधान उसको सपोर्ट नहीं करता, लेकिन उसको जेल में भी नहीं डाल सकते। लोग तो ये भी कहते हैं कि देश में प्रधानमंत्री का सिस्टम ठीक नहीं है। अमेरिका की तर्ज पर प्रेसिडेंशियल सिस्टम होना चाहिए, लेकिन हमारा कानून इसकी इजाजत नहीं देता। जो लोग हिंदू राष्ट्र की मांग पर बहस करना चाहते हैं, वो जरूर करें, लेकिन इसकी आड़ में लोगों को भड़काना गलत है।
जस्टिस लोकुर ने कहा कि जहां तक हिन्दू राष्ट्र के लिए संविधान में बदलाव की बात है तो संविधान इतनी आसानी से नहीं बदल सकते हैं। ऐसा मुमकिन ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेक्युलरिज्म संविधान का बुनियादी ढांचा है। देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए संविधान बदलना होगा। मेरे हिसाब से यह नहीं हो सकता, क्योंकि बहुमत नहीं है। बाकी जिसको जो कहना है, वह कहने के लिए आजाद है। कोई कह सकता है कि यह हिंदू राष्ट्र है, कोई कह सकता है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री वास्तव में प्रेसिडेंट है। कहने में क्या है, कोई कुछ भी कह सकता है।




