राहुल-प्रियंका से संवाद; संसद का गतिरोध तोड़ने की कवायद या सियासी गणित?

महिला आरक्षण कानून लागू करने के लिए जरूरी संवैधानिक संशोधन पर मोदी सरकार ने तेज की कवायद। राहुल-प्रियंका से मुलाकात में संसद का गतिरोध, अमित शाह का बयान, एफसीआरए संशोधन और राम मंदिर दान विवाद भी चर्चा के केंद्र में रहे।

नीट पेपर लीक को लेकर जेन-ज़ी छात्र आंदोलन, उसके बाद हुए उपचुनावों में मिले राजनीतिक झटकों और संसद में लगातार जारी गतिरोध के बीच मोदी सरकार ने अब अपना फोकस एक बार फिर अपने सबसे महत्वाकांक्षी विधायी एजेंडे पर केंद्रित कर दिया है। सरकार चाहती है कि इसी मॉनसून सत्र में महिला आरक्षण कानून को लागू करने की दिशा में सबसे अहम कदम- परिसीमन (डिलिमिटेशन) संबंधी संवैधानिक संशोधन को आगे बढ़ाया जाए। लेकिन इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छा शक्ति नहीं, बल्कि संसद में दो-तिहाई बहुमत की कठिन परीक्षा भी मोदी सत्ता के सामने खड़ी है।

इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में बुधवार को केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से लगभग 45 मिनट तक मुलाकात की। औपचारिक रूप से यह बैठक संसद की कार्यवाही सामान्य बनाने के लिए थी, लेकिन वास्तविक एजेंडा कहीं अधिक व्यापक था। खबरीलाल की मानें तो बातचीत में परिसीमन विधेयक, महिला आरक्षण कानून, एफसीआरए संशोधन विधेयक और संसद में जारी टकराव सभी मुद्दे शामिल रहे।

कांग्रेस ने सरकार को साफ शब्दों में बता और जता दिया कि संसद में सामान्य कामकाज की स्थिति तभी लौटेगी जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 20 जुलाई को शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बरता को लेकर सदन में पहले जवाब देंगे। कांग्रेस का आरोप है कि लोकतांत्रिक विरोध को पुलिस बल के जरिए दबाया गया और सरकार अब इस पूरे मामले से बचने की कोशिश कर रही है। दिलचस्प यह भी है कि छात्र आंदोलन के बाद से अमित शाह संसद की कार्यवाही में उपस्थित नहीं हो रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस इस मुद्दे को सरकार की राजनीतिक जवाबदेही से जोड़ रही है।

मोदी सरकार की असली प्राथमिकता क्या है?

सरकार की सबसे बड़ी चिंता महिला आरक्षण कानून को लागू करने की है। वर्ष 2023 में संसद ने महिला आरक्षण कानून पारित कर दिया था, लेकिन उसमें यह व्यवस्था की गई थी कि आरक्षण लागू होने से पहले नई जनगणना और उसके आधार पर परिसीमन होगा। यानी बिना परिसीमन के महिला आरक्षण केवल कानून बनकर रह जाएगा। इसी उद्देश्य से सरकार अब लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 850 तक करने वाले संवैधानिक संशोधन की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किए जाने की चर्चा है। हालांकि दक्षिण भारत के कई राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता का राजनीतिक दंड उन्हें नहीं मिलना चाहिए। यही वजह है कि यह मुद्दा सिर्फ सीटों की संख्या नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी जुड़ गया है।

राम मंदिर चंदा चोरी की चर्चा पर अड़ी कांग्रेस

कांग्रेस ने बैठक में केवल परिसीमन का विरोध नहीं दोहराया, बल्कि यह भी कहा कि राम मंदिर में कथित चंदा चोरी के मामले पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। पार्टी का मानना है कि जिस मंदिर के निर्माण को भाजपा ने अपनी सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि बताया, वहां करोड़ों रुपये के दान में कथित अनियमितताओं पर संसद चुप नहीं रह सकती। लेकिन सरकार इस मांग को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। उसका तर्क है कि मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, इसलिए संसद में उस पर चर्चा उचित नहीं होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस मुद्दे को संसद में आने से इसलिए भी बचाना चाहती है क्योंकि विपक्ष इसे संघ परिवार की नैतिक विश्वसनीयता पर हमला बनाने की कोशिश करेगा।

एफसीआरए संशोधन विधेयक भी बना विवाद

बैठक में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक पर भी चर्चा हुई। सरकार का कहना है कि गृह मंत्री अमित शाह इसी बहस के दौरान छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई पर भी अपनी बात रख सकते हैं। लेकिन कांग्रेस इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हुई। उसका कहना है कि पहले सरकार छात्र आंदोलन पर जवाब दे, उसके बाद ही किसी दूसरे विधेयक पर चर्चा आगे बढ़ेगी। कांग्रेस ने एफसीआरए संशोधन विधेयक का भी विरोध दर्ज कराया।

तो क्या सरकार के पास दो तिहाई की संख्या है?

यही वह सवाल है जो पूरी राजनीतिक कवायद का केंद्र बन गया है। लोकसभा की वर्तमान प्रभावी सदस्य संख्या 540 है। किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए कम से कम 360 सांसदों का समर्थन जरूरी होगा। सरकार को उम्मीद है कि हाल के राजनीतिक घटनाक्रम, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) से हुए कुछ दलबदल के बाद उसकी स्थिति पहले से मजबूत जरूर हुई है। लेकिन सत्ता पक्ष के भीतर भी यह स्वीकार किया जा रहा है कि विपक्ष का एक तबका जब तक सहयोग नहीं करेगा, यह आंकड़ा हासिल करना आसान नहीं होगा।

खबरीलाल की मानें तो सरकार की की नजर अब डीएमके पर है। शुरुआती दौर में यह संकेत मिले थे कि डीएमके इस प्रस्ताव पर पूरी तरह आक्रामक रुख नहीं अपनाएगी, लेकिन अब पार्टी ने अपना रुख बदल लिया है। असल में दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका है कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण हुआ तो उत्तर भारत की तुलना में उनका संसदीय प्रतिनिधित्व घट सकता है। इसलिए डीएमके इस पूरे मुद्दे को तमिलनाडु के राजनीतिक अधिकारों और संघीय संतुलन से जोड़कर देख रही है।

यदि अंतिम समय तक दो-तिहाई बहुमत को लेकर संशय बना रहता है तो सरकार विधेयक को संसद में पेश कर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेज सकती है। इससे सरकार राजनीतिक पहल अपने हाथ में रखेगी और विभिन्न दलों से सहमति बनाने के लिए अतिरिक्त समय भी मिल जाएगा।

बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ संसद का गतिरोध समाप्त करने की कवायद भर नहीं है। इसके केंद्र में भविष्य की चुनावी राजनीति, लोकसभा का नया स्वरूप, महिला आरक्षण की वास्तविक शुरुआत, उत्तर-दक्षिण का प्रतिनिधित्व, विपक्ष की एकजुटता और मोदी सरकार की राजनीतिक विश्वसनीयता, सभी एक साथ जुड़े हुए हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि सरकार यह विधेयक पारित करा लेती है तो यह उसके तीसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी संवैधानिक उपलब्धि होगी। लेकिन यदि विपक्ष संख्या बल के खेल में उसे रोकने में कामयाब रहता है तो पूरे देश में यह संदेश भी जाएगा कि संसद में राजनीतिक सहमति के बिना बड़े संवैधानिक बदलाव अब पहले जितने आसान नहीं रह गए हैं।

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प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

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