भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बार फिर रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया। लगातार तीसरी मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दर 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखी गई है। इसका सीधा अर्थ है कि फिलहाल न तो होम लोन सस्ते होंगे, न कार लोन और न ही मौजूदा EMI में कोई राहत मिलेगी। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इसके पीछे वैश्विक अस्थिरता और महंगाई के दबाव को वजह बताया। तर्क आर्थिक दृष्टि से उचित लग सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस फैसले की पूरी कीमत एक बार फिर आम उपभोक्ता ही चुकाएगा?
केंद्रीय बैंक का पहला दायित्व मूल्य स्थिरता बनाए रखना होता है। लेकिन जब लगातार तीन बैठकों तक ब्याज दरें स्थिर रखी जाती हैं, तब इसका असर केवल महंगाई तक सीमित नहीं रहता। भारत जैसे देश में, जहां मध्यम वर्ग और युवा परिवार अपने घर, शिक्षा और छोटे कारोबार के लिए बैंक ऋण पर निर्भर हैं, ऊंची ब्याज दरें आर्थिक गतिविधियों की गति को भी प्रभावित करती हैं। उपभोग घटता है, निवेश धीमा पड़ता है और बाजार में मांग कमजोर होती है। यानी महंगाई रोकने की रणनीति कहीं आर्थिक विकास की रफ्तार को ही धीमा न कर दे, यह चिंता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
RBI ने एक बार फिर दुनिया में बढ़ती अनिश्चितताओं को आधार बनाया है। इसमें भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक सप्लाई चेन की चुनौतियां शामिल हैं। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या हर बार वैश्विक परिस्थितियां ही घरेलू आर्थिक फैसलों का सबसे बड़ा आधार बननी चाहिए? भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करता है। ऐसे में क्या घरेलू मांग, रोजगार और निवेश को अधिक महत्व नहीं मिलना चाहिए?
इस फैसले से सबसे अधिक राहत बैंक एफडी (FD) में निवेश करने वालों को मिली है। ब्याज दरें फिलहाल कम नहीं होंगी, जिससे वरिष्ठ नागरिकों और बचत पर निर्भर लोगों को फायदा मिलेगा। लेकिन दूसरी ओर करोड़ों ऐसे परिवार हैं जिनकी मासिक आय का बड़ा हिस्सा EMI में चला जाता है। उनके लिए यह फैसला राहत नहीं, बल्कि इंतजार को और लंबा करने वाला है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि 2025 में RBI ने तीन बार रेपो रेट घटाकर इसे 6 प्रतिशत से 5.25 प्रतिशत तक ला दिया था। उस समय उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को गति देना था। लेकिन 2026 में अप्रैल, जून और अब अगस्त- तीनों बैठकों में ब्याज दर यथावत रखी गई। इससे यह संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल जोखिम लेने के बजाय सतर्कता की नीति पर चल रहा है।
सबसे बड़ा सवाल: महंगाई का बोझ कौन उठाए?
महंगाई केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं होती। यह रसोई, स्कूल फीस, मकान की किस्त और रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर डालती है। यदि महंगाई नियंत्रण के नाम पर ऋण महंगे बने रहते हैं और आम लोगों की क्रय शक्ति कमजोर होती जाती है, तो आर्थिक स्थिरता का लाभ समाज के किस वर्ग तक पहुंचेगा? यही वह सवाल है जिस पर नीति-निर्माताओं को गंभीरता से विचार करना होगा।
RBI का फैसला तकनीकी रूप से भले ही संतुलित दिखाई दे रहा हो, लेकिन लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था में हर आर्थिक निर्णय का सामाजिक प्रभाव भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। महंगाई पर नियंत्रण जरूरी है, पर यदि उसकी कीमत मध्यम वर्ग, युवा परिवारों और छोटे उद्यमियों को लगातार ऊंची EMI और महंगे कर्ज के रूप में चुकानी पड़े, तो यह बहस स्वाभाविक तौर पर तेज हो सकती है कि आर्थिक स्थिरता का लाभ आखिर किसे मिल रहा है।
ब्याज दरें स्थिर हैं, लेकिन आम आदमी की चिंताएं नहीं बढ़े इसकी फिक्र किसी को नहीं है। इसलिए सवाल सिर्फ रेपो रेट का नहीं, बल्कि आर्थिक नीतियों की जवाबदेही का भी है कि क्या मौद्रिक नीति केवल महंगाई के आंकड़ों से संचालित होगी या आम नागरिक की जेब और जीवन की वास्तविकताओं को भी उतनी ही गंभीरता से देखेगी?




