अपने खर्चे को पूरा करने के लिए फिर बड़ा कर्ज लेने जा रही मोदी सरकार!

भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 (अप्रैल-सितंबर) की पहली छमाही में 8 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेने का ऐलान किया है। यह कर्ज पूरे साल के लोन टारगेट 14.82 लाख करोड़ रुपये का 54% है। मोदी सरकार का यह कदम सरकार के वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने और देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए काफी अहम माना जा रहा है।

केंद्र की मोदी सरकार ने FY2026 में अपने GDP के 4.4% तक वित्तीय घाटे का लक्ष्य रखा है। वित्तीय घाटा वह अंतर है जो सरकार की कुल आय और कुल खर्च में होता है। इसे कम करना किसी भी सरकार के लिए जरूरी होता है, ताकि देश की आर्थिक स्थिति स्थिर रहे।

सरकार का 8 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेने का निर्णय इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए लिया जा रहा है। सरकार के लिए इस घाटे को नियंत्रित करना और आवश्यक सार्वजनिक खर्चों को बनाए रखना एक जटिल कार्य है, क्योंकि इसके लिए बाजार से कर्ज लेना जरूरी होता है।

केंद्र सरकार ने इस कर्ज को दो चरणों में लेने का निर्णय लिया है: पहले छह महीनों में 8 लाख करोड़ और दूसरे छह महीनों में 6.82 लाख करोड़। यह विभाजन सरकार को अधिक लचीलापन प्रदान करता है और बाजारों पर दबाव कम करता है। अगर सरकार पूरी रकम एक साथ लेती तो इससे ब्याज दरों में वृद्धि हो सकती थी और कर्ज महंगा हो सकता था। इस तरह से कर्ज लेने की प्रक्रिया को एक अच्छे तरीके से प्रबंधित किया गया है ताकि बाजार पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

सरकार FY26 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के दौरान हर हफ्ते 19,000 करोड़ के ट्रेजरी बिल्स जारी करेगी। ट्रेजरी बिल्स सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले शॉर्ट-टर्म ऋण उपकरण होते हैं, जिनकी अवधि एक साल तक हो सकती है। ये बिल्स सरकार को तत्काल वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करते हैं।

साप्ताहिक ट्रेजरी बिल्स के जरिए सरकार को जरूरी नकदी मिल सकेगी ताकि वह अपने तात्कालिक वित्तीय दायित्वों को पूरा कर सके। यह तरीका भी शॉर्ट-टर्म वित्तीय दबाव को कम करने में सहायक होगा, लेकिन इन बिल्स को ध्यान से प्रबंधित करना होगा ताकि देश पर ज्यादा शॉर्ट-टर्म कर्ज का बोझ न बढ़े।

ग्रीन बॉन्ड : सरकार की एक नई पहल
केंद्र सरकार 10,000 करोड़ के ग्रीन बॉन्ड जारी करने का भी निर्णय ले चुकी है। ग्रीन बॉन्ड एक प्रकार के ऋण उपकरण होते हैं जिनका उपयोग पर्यावरणीय परियोजनाओं के लिए किया जाता है, जैसे कि अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और प्रदूषण नियंत्रण। भारत में ग्रीन बॉन्ड का यह पहला बड़ा कदम है, जो न केवल सरकार को धन जुटाने में मदद करेगा, बल्कि भारत की पर्यावरणीय स्थिरता को भी बढ़ावा देगा। इस कदम से सरकार को एक नई निवेशक श्रेणी को आकर्षित करने का मौका मिलेगा जो अपने निवेश को पर्यावरणीय दृष्टिकोण से जिम्मेदार ठहराना चाहते हैं। यह निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने के साथ-साथ भारत के कर्ज बाजार को भी सशक्त बनाएगा।

भारत सरकार पर कर्ज का बढ़ता दबाव
भारत सरकार पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके कारण सरकार को अपने वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने में चुनौतियां आ रही हैं। साल 2004 में जब मनमोहन सिंह की सरकार बनी थी तो भारत सरकार पर कुल कर्ज 17 लाख करोड़ रुपए का था। 2014 तक तीन गुना से ज्यादा बढ़कर ये 55 लाख करोड़ रुपए हो गया। वित्तीय वर्ष 2023-24 (FY24) तक भारत सरकार का कुल कर्ज 160 लाख करोड़ तक पहुंच चुका था, जो देश की जीडीपी के करीब 90% के आस-पास था। कर्ज की यह रकम वित्तीय वर्ष 2024-25 तक 200 लाख करोड़ को पार कर जाने का अनुमान जताया जा रहा है। यह कर्ज दोनों घरेलू और विदेशी स्रोतों से लिया गया है।

भारत सरकार का कर्ज मुख्यत दो प्रकार का होता है- घरेलू कर्ज और विदेशी कर्ज। घरेलू कर्ज भारतीय बाजार से लिया जाता है, जिसमें सरकारी बॉन्ड्स और अन्य ऋण शामिल होते हैं। इसका हिस्सा सरकार के कुल कर्ज का प्रमुख हिस्सा होता है। विदेशी कर्ज अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, विदेशी बैंकों और अन्य देशों से लिया जाता है। हालांकि इसका हिस्सा कुल कर्ज का एक छोटा हिस्सा होता है, लेकिन विदेशी कर्ज पर ब्याज दर अधिक होती है।

कर्ज का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भारत सरकार के कर्ज लेने का निर्णय कई तरह से अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा। सकारात्मक पहलू यह है कि इससे सरकार को देश की विकास योजनाओं के लिए आवश्यक धन मिल सकेगा। सार्वजनिक खर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को गति मिलेगी, जो देश की आर्थिक वृद्धि को प्रेरित करेगा।

इसके अतिरिक्त, सरकार का यह कदम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को यह संदेश देगा कि भारत अपनी वित्तीय स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह निवेशकों का विश्वास बढ़ाएगा और विदेशी निवेश को आकर्षित करेगा।

हालांकि, बड़े पैमाने पर कर्ज लेने के कुछ जोखिम भी होते हैं। सबसे बड़ा खतरा मुद्रास्फीति (Inflation) का है। जब सरकार ज्यादा कर्ज लेती है तो इससे बाजार में धन की आपूर्ति बढ़ जाती है, जो मुद्रास्फीति को बढ़ा सकता है। इसके अलावा, कर्ज की बढ़ती मात्रा से सरकार को भविष्य में इसे चुकाने के लिए और अधिक संसाधन जुटाने होंगे, जो एक बड़ा आर्थिक दबाव बना सकता है। ब्याज दरों में भी वृद्धि हो सकती है। सरकार द्वारा अधिक कर्ज लेने से यदि बाजार में कर्ज की आपूर्ति बढ़ जाती है तो निवेशक उच्च ब्याज दर की मांग कर सकते हैं। इससे व्यवसायों और उपभोक्ताओं के लिए कर्ज महंगा हो सकता है, जिसका असर निवेश और उपभोग पर पड़ेगा।

सरकार का कर्ज लेने का निर्णय एक दीर्घकालिक विकास योजना का हिस्सा है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह कर्ज जरूरी होता है ताकि बुनियादी ढांचे में निवेश किया जा सके, सामाजिक कल्याण योजनाओं को आगे बढ़ाया जा सके और औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया जा सके।

सरकार का यह कदम दिखाता है कि वह वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने और भारत की विकास योजनाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, इसके साथ-साथ सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि कर्ज का स्तर सीमा से अधिक न बढ़े, ताकि भविष्य में और अधिक आर्थिक संकटों से बचा जा सके।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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