सत्यप्रकाश
नई दिल्ली : राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने उच्चतम न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में कहा है कि देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे आधिकारिक और गैर आधिकारिक मदरसों में बच्चों के अधिकारों पर चोट पहुंचाई जा रही है तथा ये देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बना रहे हैं। यह मदरसा शिक्षा प्रक्रिया और प्रणाली बच्चों के मूल अधिकारों का हनन कर रही है और इससे बच्चे आधुनिक शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। मदरसों की शिक्षा प्रणाली संवैधानिक शिक्षा के अधिकार पर भी भारी पड़ रही है।
आयोग का कहना है कि मदरसों में धार्मिक शिक्षा तथा कर्मकांड पर जोर दिया जाता है जिससे बच्चों का मानसिक विकास आधुनिक समय के अनुरूप नहीं हो रहा है। मदरसों में शिक्षा पाए हुए बच्चे समाज के अन्य क्षेत्रों में पिछड़ रहे हैं और वे समाज के कल्याण में अपना योगदान नहीं दे पाते हैं।
मदरसों का पाठ्यक्रम शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुरूप नहीं है। लिहाजा बच्चे आवश्यक कौशल और प्रशिक्षण से वंचित होते हैं। बच्चों को न केवल एक उपयुक्त शिक्षा से वंचित किया जाता है, बल्कि एक स्वस्थ वातावरण और विकास के बेहतर अवसरों से भी वंचित किया जाता है। मदरसों में कई शिक्षक ऐसे होते हैं, जिन्हें कुरान और धार्मिक ग्रंथों की जानकारी के आधार पर नियुक्त कर लिया जाता है। उन्होंने शिक्षक बनने के लिए जरूरी प्रशिक्षण नहीं लिया होता है।
बिहार, मध्य प्रदेश , पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कई मदरसों में गैर मुसलमान बच्चे भी शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं। उन्हें बलपूर्वक इस्लाम की शिक्षा दी जाती है और पाठ्यक्रम में इस्लाम धर्म की सर्वोच्चता बताई जाती है। यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। हलफनामे में कहा गया है कि मदरसों के पाठ्यक्रम में ऐसी विषय वस्तु शामिल है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।
उत्तर प्रदेश में सहारनपुर के देवबंद में दारुल उलूम देवबंद मदरसा धार्मिक एवं राजनीतिक विचारधाराओं से प्रभावित है। इस मदरसे का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि मदरसे शिक्षा के लिए उचित स्थान नहीं है। मदरसों में मनमाने तरीकों से शिक्षा दी जाती है जो मानकों के अनुरुप नहीं हैं और बच्चों को मानसिक तथा शारीरिक यातना से गुजरना पड़ता है। यह पाकिस्तान-अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान से संबद्ध है।
मदरसे में पढ़ाई जाने वाली पुस्तक “बहिश्ती जेवर” का उल्लेख करते हुए आयोग ने कहा है कि इसमें बाल यौन शोषण को उकसाने वाली विषय वस्तु है। यह बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम 2002- पोक्सो का स्पष्ट रूप से उल्लंघन है। आयोग का कहना है कि इस मदरसे से बच्चों के साथ यौन संबंध और आत्मघाती हमलों के बारे में भी विवादास्पद फतवे दिए गए हैं।
मदरसों में बाल अधिकारों से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में दिए गए अधिकारों का भी उल्लंघन होता है। यह अधिकार जीवन, विधि के समक्ष समानता और भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करते हैं। मदरसों की अपनी व्यवस्था होने के कारण इनमें पढ़ने वाले बच्चे सरकार की मिड-डे मील योजना, यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाओं से वंचित रहते हैं। मदरसे में गैर मुसलमान बच्चों को इस्लाम की शिक्षा देकर संविधान के अनुच्छेद 28(3) का उल्लंघन किया जा रहा है। यह अनुच्छेद माता-पिता की अनुमति के बगैर बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने को प्रतिबंधित करता है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2004 को पिछले दिनों रद्द कर दिया था। इसके विरोध में मदरसा मालिकों, संस्थानों और अध्यापकों ने उच्चतम न्यायालय में इसके विरुद्ध अपील की है। इसी संदर्भ में आयोग ने यह हलफनामा दिया है। उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी है।
उत्तर प्रदेश सरकार मदरसों को सालाना तकरीबन 1098 करोड़ रुपए जारी करती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में सभी मदरसों को विदेश से फंडिंग होने के मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय विशेष कार्यबल – एसआईटी का गठन किया था। इसने करीब 13 हजार मदरसों में तमाम गड़बड़ियां होने का खुलासा रिपोर्ट में किया था। बीते छह माह से जांच कर रही एसआईटी दो रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी है। जांच पूरी होने के बाद अंतिम रिपोर्ट दी जाएगी।
एसआईटी की अब तक की पड़ताल में सामने आया है कि नेपाल सीमा से सटे जिलों में सैंकड़ों की संख्या में मदरसे खोले जा चुके हैं। इनमें से ज्यादातर अपनी आय और व्यय का हिसाब एसआईटी को नहीं दे सके। चंदे से मदरसे के निर्माण का दावा तो किया, लेकिन पैसा देने वालों का नाम नहीं बता सके।
बहरहाल, देशभर में फैले मदरसों के बारे में समाज और सरकार को सोच-समझकर फैसला करना होगा। ये मदरसे बच्चों के न केवल वर्तमान पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं बल्कि भविष्य को भी अंधकारमय बना रहे हैं। इससे करोड़ों बच्चों का भविष्य जुड़ा है और उनके साथ ही देश का भविष्य भी। हालांकि मदरसे शिक्षा के ही केंद्र होते हैं लेकिन इनमें से कुछ अनैतिक एवं असामाजिक गतिविधियों के केंद्र भी बन रहे हैं। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए भी ये आज सुरक्षित शरणगाह बना हुआ है।




