वन नेशन वन इलेक्शन को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दी मंजूरी, इसी साल संसद में आएगा विधेयक

लोकसभा के साथ ही देश के सभी विधानसभा चुनाव (वन नेशन वन इलेक्शन) करवाने के प्रस्ताव को बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। इसी साल शीतकालीन सत्र यानी नवंबर-दिसंबर में संसद में इस आशय का विधेयक पेश किया जाएगा।

केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस वार्ता में कहा कि पहले चरण में विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ होंगे। इसके बाद 100 दिन के भीतर दूसरे चरण में निकाय चुनाव कराए जाएं। एक दिन पहले ही 17 सितंबर को गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सरकार इसी कार्यकाल में ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ लागू करेगी।

मालूम हो कि वन नेशन वन इलेक्शन पर विचार के लिए बनाई गई पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली कमेटी ने 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। 2 सितंबर 2023 को पैनल बनाया गया था। तमाम स्टेकहोल्डर्स-एक्सपर्ट्स से चर्चा के बाद 191 दिन के मंथन के बाद 18 हजार 626 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की गई। कमेटी ने सभी विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 तक करने का सुझाव दिया है।

रामनाथ कोविंद पैनल ने जो पांच अहम सुझाव दिए हैं वह निम्नलिखित हैं-

  • सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल अगले लोकसभा चुनाव यानी 2029 तक बढ़ाया जाए।
  • अगर किसी विधानसभा चुनाव में किसी को बहुमत नहीं आता है तो नो कॉन्फिडेंस मोशन होने पर बाकी 5 साल के कार्यकाल के लिए नए सिरे से चुनाव कराए जा सकते हैं।
  • पहले चरण में लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं, उसके बाद दूसरे चरण में 100 दिनों के भीतर लोकल बॉडी के इलेक्शन कराए जा सकते हैं।
  • चुनाव आयोग लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय निकाय चुनावों के लिए राज्य चुनाव अधिकारियों के परामर्श से सिंगल वोटर लिस्ट और वोटर आई कार्ड तैयार करेगा।
  • पैनल ने एक साथ चुनाव कराने के लिए उपकरणों, जनशक्ति और सुरक्षा बलों की एडवांस प्लानिंग की भी सिफारिश की है।

रामनाथ कोविंद कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में 18 संवैधानिक बदलावों का सुझाव दिया है। हालांकि इनमें से ज्यादातर में राज्यों की विधानसभाओं के सहमति की जरूरत नहीं है।
लेकिन कुछ संवैधानिक बदलावों के लिए बिलों को संसद में पास कराना जरूरी होगा।
संभव है कि कोविंद कमेटी की रिपोर्ट पर लॉ कमीशन भी अपनी रिपोर्ट पेश करे।
देखना अहम होगा कि इस विधेयक के कानून बनने में कोई बाधा आती है या फिर इसे आंखें मूंदकर बिना किसी बहस से संसद से पारित कर दिया जाता है।

हालांकि विपक्षी नेताओं ने वन नेशन वन इलेक्शन पर जिस तरह की तीखी प्रतिक्रिया दी है, लगता नहीं है कि यह विधेयक आसानी से कानून बन जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि ‘कांग्रेस पार्टी ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के प्रस्ताव का विरोध करती है। कांग्रेस का मानना है लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए जब भी जरूरत हो चुनाव होने चाहिए।’

केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने कहा, ‘संघ परिवार भारत की चुनावी राजनीति को राष्ट्रपति प्रणाली की ओर ले जाने का गुप्त प्रयास कर रहा है। एक राष्ट्र, एक चुनाव का नारा भारतीय संसदीय लोकतंत्र की विविधतापूर्ण प्रकृति को खत्म करने के लिए गढ़ा गया है।’

राजद सांसद मनोज कुमार झा कहते हैं, ‘इस देश में वन नेशन वन इलेक्शन पहले भी था। मोदी जी कोई नायाब हीरा नहीं ला रहे हैं। 1962 के बाद वह क्यों हटा क्योंकि एकल पार्टी का प्रभुत्व खत्म होने लगा। मैं पहले इसका मसौदा देखूंगा। मान लीजिए- चुनाव होते हैं, उत्तर प्रदेश में बनी हुई सरकार गिर जाती है तो फिर क्या होगा? क्या आप राष्ट्रपति शासन लगाएंगे?’

एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी का कहना है, ‘आप अपनी सुविधा के आधार पर यह काम नहीं कर सकते। संविधान संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर काम करेगा। यह हमेशा से भाजपा और आरएसएस की विचारधारा रही है। वे नहीं चाहते कि क्षेत्रीय दल अस्तित्व में रहें। हमने इसका विरोध किया है और आगे भी करेंगे।’

बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक देश, एक चुनाव की व्यवस्था पर कहा कि इसके तहत देश में लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय का चुनाव एक साथ कराने का केंद्र सरकार के प्रस्ताव का हम समर्थन करते हैं, लेकिन इसका उद्देश्य देश और जनहित में होना जरूरी है।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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