ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे अमेरिका के सबसे क़रीबी सहयोगी देशों का फ़लस्तीन के समर्थन में सिर्फ खड़ा ही नहीं होना, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने का ऐलान कर देना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर बड़ी घटना के तौर पर देखा जा रहा है। यह केवल एक कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि नई वैश्विक व्यवस्था में धीरे-धीरे आ रहे बदलाव का संकेत भी है जिसे अमेरिका की दशकों पुरानी मध्य-पूर्व नीति और उसके वैश्विक नेतृत्व की वैधता को खुली चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।
तीन मित्र राष्ट्रों की नई चाल
एक जमाने से ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया को “अमेरिकी विदेश नीति का सशक्त स्तंभ” के रूप में देखा जाता रहा है। ये देश हमेशा से इज़राइल के साथ खड़े होते रहे हैं। लेकिन अब इनकी बदलती नीति इस बात का संकेत दे रही है कि इन देशों में घरेलू जनमत फ़लस्तीन के समर्थन में झुक रहा है। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों की तरफ से की जा रही आलोचनाएं भी असर दिखा रही हैं। इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों से पश्चिमी देशों की सोसायटी में नैतिक असहजता बढ़ रही है। ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सत्ता में वापसी ने इस रुख को और मजबूती दी है। कनाडा में आगामी चुनावों और ऑस्ट्रेलिया की प्रगतिशील राजनीति ने भी इस फैसले को संभव बनाया।
अमेरिकी चुप्पी में कितना शोर?
अमेरिका, जो दशकों से इज़राइल का सबसे मज़बूत रक्षा कवच रहा है, इन घटनाओं पर सार्वजनिक रूप से तो संयमित प्रतिक्रिया दे रहा है, लेकिन वॉशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में बेचैनी स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। सवाल यह नहीं है कि अमेरिका फ़लस्तीन को मान्यता क्यों नहीं देता। असली सवाल यह है कि उसके सबसे करीबी सहयोगी अब उससे बिना सलाह-मशविरा के फैसला सुना दे रहे हैं। क्या इसे अमेरिका की नैतिक विफलता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए? या कहीं यह पश्चिमी देशों की एकता में गहराती दरारों की शुरुआत तो नहीं है?
इज़राइल की कूटनीतिक घबराहट
इज़राइल ने इन तीन देशों द्वारा दी गई मान्यताओं को “आतंकवाद को इनाम” देने जैसा बताया है। उसका यह गुस्सा स्वाभाविक भी है लेकिन यहां देखना होगा कि ग्लोबल नैरेटिव अब इज़राइली सुरक्षा से ज़्यादा फ़लस्तीनियों के आत्मनिर्णय पर केंद्रित हो रहा है। सैन्य ताकत के सहारे कूटनीतिक वैधता बनाए रखना अब पहले जितना आसान नहीं रहा। इसराइल के विदेश मंत्रालय ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि फ़लस्तीन को देश के रूप में मान्यता देना “जिहादी हमास के लिए इनाम के अलावा और कुछ नहीं है।” लेकिन ब्रिटेन के पीएम स्टार्मर का साफ कहना है कि इस घोषणा को हमास से नहीं जोड़ना चाहिए और यह समाधान हमास को किसी तरह का इनाम नहीं है।
क्या होगी भारत की रणनीति?
भारत के लिए निश्चित तौर पर यह एक नाजुक क्षण है। एक ओर वह पारंपरिक रूप से फ़लस्तीन का समर्थन करता आया है- आज से नहीं, महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के समय से। वहीं दूसरी ओर 1990 के दशक के बाद से इज़राइल के साथ उसके रणनीतिक और रक्षा संबंधों में ज़बर्दस्त विस्तार हुआ है।
आज भारत की स्थिति को बयां करें तो वह अब भी “दो राष्ट्र समाधान” का समर्थन करता है। इज़राइल से 10 अरब डॉलर से अधिक का रक्षा व्यापार करता है। फ़लस्तीन के लिए मानवीय सहायता और राजनीतिक समर्थन तो जारी रखता है लेकिन अभी तक फ़लस्तीन को आधिकारिक रूप से संप्रभु राष्ट्र नहीं माना है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की विदेश नीति संतुलन की मिसाल मानी जाती रही है, लेकिन यही संतुलन अब चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
भारत की अग्निपरीक्षा का वक्त
भारत के लिए यह एक ऐसा वक्त है जब वह अपने ऐतिहासिक मूल्यों- स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, और न्याय को केवल भाषणों में नहीं, बल्कि निर्णायक कूटनीतिक कार्रवाइयों में भी प्रतिबिंबित करे। ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया का कदम सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है। यह ग्लोबल नैरेटिव बदलने की प्रक्रिया का भी हिस्सा है। भारत को अब यह तय करना होगा कि वह इस बदलते नैरेटिव में एक दर्शक की भूमिका निभाएगा या या सक्रिय भागीदार। फ़लस्तीन को संप्रभुता देना एक राष्ट्र के आत्म-सम्मान को मान्यता देने जैसा है। भारत, जो खुद उपनिवेशवाद से निकला है, क्या इस मान्यता से पीछे हट सकता है?
अलग-थलग पड़ता अमेरिका
फ़लस्तीन को लेकर दुनियाभर के देशों की अलग-अलग राय जरूर है लेकिन उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिए जाने को लेकर अमेरिका अलग-थलग पड़ गया है। इसी साल जुलाई में संयुक्त राष्ट्र में दिए एक भाषण में ब्रिटेन के पूर्व विदेश मंत्री डेविड लैमी ने कहा था, “दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करने के लिए ब्रिटेन पर ख़ास ज़िम्मेदारी है।”
फ़िलहाल, संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से लगभग 75 प्रतिशत (150) देश फ़लस्तीन को मान्यता दे चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन को ‘स्थायी पर्यवेक्षक’ का दर्जा मिला है। इससे वह बैठकों में तो हिस्सा ले सकता है लेकिन उसे मतदान का अधिकार नहीं है। ब्रिटेन और फ़्रांस से मान्यता मिलने के बाद, ऐसी उम्मीद की जा रही है कि फ़लस्तीन को जल्द ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से चार का समर्थन मिल जाएगा। चीन और रूस ने 1988 में ही फ़लस्तीन को मान्यता दे दी थी। इस तरह, अमेरिका अकेला देश बच जाएगा जिसने उसे मान्यता नहीं दी है।
अमेरिका ने 1990 के दशक के मध्य में बनी फ़लस्तीनी अथॉरिटी को मान्यता दी थी जिसका नेतृत्व महमूद अब्बास कर रहे हैं। तब से अब तक कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भविष्य में फ़लस्तीन को एक देश बनाने का समर्थन किया, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप उनमें शामिल नहीं हैं। दोनों कार्यकाल में ट्रंप की नीतियां पूरी तरह से इसराइल के पक्ष में रही हैं न कि फ़लस्तीन को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता देना।
चलते-चलते अंत में जी-7 समूह देशों की बात करें तो कनाडा फ़लस्तीन को मान्यता देने वाला पहला जी-7 देश बना। जी-7 देशों में फ़्रांस, कनाडा, इटली, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका शामिल हैं। ये देश वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाते हैं। फ़्रांस पहला जी-7 देश था जिसने कहा था कि वह फ़लस्तीन को मान्यता देगा. लेकिन इसकी घोषणा वह संयुक्त राष्ट्र महासभा में आधिकारिक तौर पर करेगा। इटली, जर्मनी और जापान ने फ़लस्तीन को मान्यता देने का कोई वादा अभी नहीं किया है।




