रमिरा तनेजा का बड़ा बयान- बोझ उठाते हैं क्रिएटर्स और पूरा ईनाम हड़प ले जाते हैं OTT प्लेटफॉर्म्स

मुंबई। RamiiPhy Entertainment की संस्थापक और सीईओ रमिरा तनेजा ने मीडिया कॉन्फ़्रेंस में OTT इंडस्ट्री में हो रहे शोषण के खिलाफ जबरदस्त तरीके से आवाज़ उठाई है। रमिरा ने कहा कि क्रिएटर्स को ओटीटी राइट्स से अब कोई निश्चित कमाई नहीं होती है। स्ट्रीमिंग (OTT) प्लेटफॉर्म्स लगातार बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) हड़पने की कोशिश कर रहे हैं।

दरअसल, मुंबई के कांदिवली स्थित केईएस शॉफ कॉलेज में 12-13 सितंबर 2025 को आयोजित हुई दो दिवसीय राष्ट्रीय मीडिया कॉन्फ़्रेंस में मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के बदलते परिदृश्य पर गहन चर्चा हुई। इसी कार्यक्रम में RamiiPhy Entertainment की संस्थापक और सीईओ रमिरा तनेजा ने “Hybrid Workflows in Media Industries: Efficiency and Exploitation” विषय पर अपने संबोधन में इस बात का खुलासा किया कि किस तरह से OTT प्लेटफॉर्म्स ने क्रिएटर्स पर पूरा वित्तीय भार डाल दिया है और फिर भी उनके अधिकारों पर दावा करते हैं।

रमिरा ने कहा, “अब प्लेटफॉर्म्स कहते हैं- पहले खुद फ़ाइनेंस की व्यवस्था करो, थिएटर में रिलीज़ करो और फिर हम देखेंगे। और अंत में वे पूरी Intellectual Property अपने नाम करना चाहते हैं। मतलब यह कि OTT राइट्स अब कमाई का ज़रिया नहीं, एक जुआ बन चुके हैं।

रमिरा ने बताया कि पहले जहां OTT राइट्स से निर्माता को एक निश्चित आमदनी मिलती थी, अब वह अनिश्चित और मनमाने दांव का मामला बन चुका है। कोई फिक्स रेवेन्यू मॉडल नहीं बचा है। स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म IP राइट्स हथियाने की कोशिश करते हैं। सारा वित्तीय और रचनात्मक जोखिम अब क्रिएटर्स और प्रोड्यूसर्स पर डाल दिया गया है

रमिरा ने यह भी बताया कि AI के आने से रचनात्मक कंटेंट की अवधारणा ही धुंधली हो रही है। मौलिकता किसकी है, ये तय करना मुश्किल होता जा रहा है। जब रमिरा से उभरते फिल्मकारों के लिए रास्ता पूछा गया तो उन्होंने तीन प्रमुख समाधान सुझाए:

1. कम्युनिटी बिल्डिंग (Community Building): अपने दर्शकों की कम्युनिटी बनाएं जो सिर्फ दर्शक न होकर समर्थक और संरक्षक भी हों।

2. इक्विटी पार्टनरशिप्स (Equity Partnerships): एकाधिक प्रोड्यूसर्स के साथ काम करें, ताकि रिस्क और रिवॉर्ड दोनों साझा हो सकें।

3. क्राउडफंडिंग (Crowd funding): Kickstarter, Milaap, Wishberry जैसे प्लेटफॉर्म्स का उपयोग कर क्रिएटिव इंडिपेंसी के साथ धन जुटाया जा सकता है।

इस कॉन्फ्रेंस में रमिरा तनेजा के साथ मंच पर जाने-माने शिक्षाविद प्रो. उज्ज्वल के. चौधरी, रोमिल धोढ़ीवाला (एजीएम– मार्केटिंग, एलाइड डिजिटल), गुंजन पाई (संस्थापक, Copy Love), प्रो. अम्ब्रिश सक्सेना (साउथ एशियन यूनिवर्सिटी), चिन्मय भावे (BITS Design) और प्रवीण नागदा (फिल्म फेस्टिवल डायरेक्टर) जैसी हस्तियां भी मौजूद थीं।

कॉन्फ़्रेंस के अनुभव को साझा करते हुए रमिरा ने कहा, “ऐसे मंचों पर विचार साझा करना, युवा प्रतिभाओं को मार्गदर्शन देना मेरे लिए बेहद समृद्ध अनुभव रहा। मैं विशेष रूप से केईएस शॉफ कॉलेज की प्रिंसिपल लिली भूषण और विद्या राजोरा को इस आयोजन के लिए धन्यवाद देती हूं।”

रमिरा तनेजा आज के दौर में इंडियन मीडिया इंडस्ट्री की सबसे प्रभावशाली और मुखर थॉट लीडर्स के तौर पर शुमार की जा रही हैं। उनकी दृष्टि में वो स्पष्टता है जो इंडस्ट्री को नए मानदंडों और नीतियों की ओर ले जाने में सक्षम है।

OTT और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स भले ही आज के मनोरंजन उद्योग के केंद्र में हों, लेकिन रमिरा तनेजा की चेतावनी हमें परदे के पीछे की सच्चाई देखने को मजबूर करती है। जो लोग कहानियां गढ़ते हैं- लेखक, निर्देशक, निर्माता उन्हें अगर सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि सिस्टम का हिस्सा भी बनना है तो उनके अधिकार, आय और संपत्ति की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाना ज़रूरी है।

क्या आपको लगता है कि वर्तमान OTT मॉडल रचनाकारों के लिए न्यायपूर्ण है? क्या सरकार या गिल्ड्स को उनके लिए कोई सुरक्षा ढांचा बनाना चाहिए? तो नीचे अपनी टिप्पणी जरूर साझा करें।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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