नई दिल्ली। गुरुवार देर रात को 12 घंटे से ज्यादा लंबी की चर्चा के बाद वक्फ संशोधन बिल (Waqf Amendment Bill 2025) राज्यसभा से भी पास हो गया। बिल के पक्ष में 128 और विरोध में 95 वोट पड़े। इससे पहले बुधवार को लोकसभा में यह बिल 12 घंटे की चर्चा के बाद पास हुआ था। अब इसे राष्ट्रपति के पास जाएगा। उनकी स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून का आकार ले लेगा।
इस बीच वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में दो याचिका लगाई गई। बिहार के किशनगंज से कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद और हैदराबाद से AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने यह याचिका लगाई है। इससे पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और फिर कांग्रेस ने कहा था कि वह बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने यह जानकारी देते हुए x पर लिखा था, “कांग्रेस जल्द ही वक़्फ संशोधन विधेयक, 2024 की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। हम भारत के संविधान में शामिल सिद्धांतों और प्रावधानों पर किए जा रहे मोदी सरकार के हमलों का विरोध जारी रखेंगे।”
इस पर बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा, “कांग्रेस के कुछ क़ानूनविद द्वारा कहा जा रहा है कि यह बिल असंवैधानिक है। हम कोर्ट जाएंगे, तो जाएं कोर्ट। कोई रोक तो है नहीं। संविधान के छात्र के रूप में, मैं प्रमाणिकता से बोलना चाहूंगा कि यह जो वक़्फ़ संशोधन बिल है, बिल्कुल संविधान सम्मत है।”
नीतीश कुमार की जेडीयू ने वक्फ बिल संशोधन बिल पर मोदी सरकार का समर्थन किया है। इससे नाराज पार्टी के पांच मुस्लिम नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है। इनमें अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव मोहम्मद शाहनवाज मलिक, प्रदेश महासचिव मो. तबरेज सिद्दीकी अलीग, भोजपुर से पार्टी सदस्य मो. दिलशान राईन और मोतिहारी की ढाका विधानसभा सीट से पूर्व प्रत्याशी मोहम्मद कासिम अंसारी शामिल हैं।
वक़्फ संशोधन पर नया बिल, 1995 के वक़्फ एक्ट को संशोधित करने के लिए लाया गया है। इस बिल का नाम है- यूनाइटेड वक़्फ मैनेजमेंट एम्पॉवरमेंट, एफिशिएंसी एंड डेवलपमेंट एक्ट-1995 यानी उम्मीद। तकरीबन सभी विपक्षी पार्टियां इस बिल का विरोध कर रही थीं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने संसद में कहा भी कि “ये विधेयक संविधान के ख़िलाफ़ है और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।”
पिछले साल अगस्त में जब ये बिल पेश हुआ था उस वक्त संसद में खूब हंगामा हुआ था और तब इसे संयुक्त संसदीय कमेटी (जेपीसी) को भेज दिया गया था। इस समिति के अध्यक्ष बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल हैं। 13 फरवरी 2025 को इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसे 19 फरवरी को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दे दी थी। हालांकि, जेपीसी में शामिल विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया कि उनके सुझाए गए बदलावों को सरकार ने ख़ारिज कर दिया।
नए बिल में किन प्रावधानों पर है विवाद?
पिछले करीब दो वर्षों में देश के अलग-अलग हाईकोर्ट में वक़्फ से जुड़ी करीब 120 याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसके बाद इस कानून में संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं। अदालत में दी गई अर्ज़ियों में वक़्फ कानून की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि जैन, सिख और अन्य अल्पसंख्यकों समेत दूसरे धर्मों में ऐसे कानून लागू नहीं होते.
नए बिल के प्रावधान के अनुसार, वही व्यक्ति दान कर सकता है जिसने लगातार पांच साल तक मुसलमान धर्म का पालन किया हो यानी मुस्लिम हो और दान की जा रही संपत्ति का मालिकाना हक रखता हो। वक़्फ एक्ट में दो तरह की वक़्फ संपत्ति का जिक्र है। पहला वक़्फ अल्लाह के नाम पर होता है यानी, ‘ऐसी मिल्कियत (संपत्ति) जिसे अल्लाह को समर्पित कर दिया गया है और जिसका कोई वारिसाना हक बाकी न बचा हो।’ दूसरा वक्फ ‘वक़्फ अलल औलाद है यानी ऐसी वक़्फ संपत्ति जिसकी देख-रेख वारिस करेंगे।’
इस दूसरे प्रकार के वक़्फ में नए बिल में प्रावधान किया गया है कि उसमें महिलाओं के विरासत का अधिकार खत्म नहीं होना चाहिए। ऐसी दान की हुई संपत्ति एक बार सरकार के खाते में आ गई तो जिले का कलेक्टर उसे विधवा महिलाओं या बिना मां-बाप के बच्चों के कल्याण में इस्तेमाल कर सकेगा।
ऐसी संपत्ति या जमीन पर अगर पहले से ही सरकार काबिज हो और उस पर वक़्फ बोर्ड ने भी वक़्फ संपत्ति होने का दावा कर रखा हो तो नए बिल के अनुसार वक़्फ का दावा तब डीएम के विवेक पर निर्भर करेगा। नए बिल के अनुसार, कलेक्टर सरकार के कब्जे में मौजूद वक़्फ के दावे वाली ऐसी जमीन के बारे में अपनी रिपोर्ट सरकार को भेज सकते हैं। कलेक्टर की रिपोर्ट के बाद अगर उस संपत्ति को सरकारी संपत्ति मान लिया गया तो राजस्व रिकॉर्ड में वह हमेशा के लिए सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज हो जाएगी।
प्रस्तावित बिल में वक़्फ बोर्ड के सर्वे का अधिकार ख़त्म कर दिया गया है। बिल के प्रावधान के अनुसार, अब वक़्फ बोर्ड सर्वे करके यह नहीं बता सकेगा कि कोई संपत्ति वक़्फ की है या नहीं। मौजूदा एक्ट में वक़्फ बोर्ड के सर्वे कमिश्नर के पास वक़्फ के दावे वाली संपत्तियों के सर्वे का अधिकार है लेकिन प्रस्तावित बिल में संशोधन के बाद सर्वे कमिश्नर से यह अधिकार लेकर उसे जिले के कलेक्टर को दे दिया जाएगा।
प्रस्तावित बिल के अन्य प्रावधान जिन पर आपत्तियां हैं, उनमें एक वक़्फ काउंसिल के स्वरूप का भी है। सेन्ट्रल वक़्फ काउंसिल के सभी सदस्यों का मुसलमान होना अनिवार्य है लेकिन प्रस्तावित विधेयक में दो ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों का प्रावधान भी जोड़ दिया गया है। इसके साथ ही सेंट्रल वक़्फ काउंसिल के मुस्लिम सदस्यों में भी दो महिला सदस्यों का होना अनिवार्य कर दिया गया है।
विधेयक के अन्य प्रस्तावों में शिया और सुन्नी के अलावा बोहरा और आगाख़ानी के लिए अलग से बोर्ड बनाने की बात कही गई है। मौजूदा एक्ट के मुताबिक, शिया वक़्फ बोर्ड तभी बनाया जा सकता है, जब वक़्फ की कुल संपत्ति में 15 फीसदी संपत्ति एवं आमदनी की हिस्सेदारी शिया समुदाय के पास हो। अभी देश में जितने भी वक़्फ बोर्ड हैं, उनमें सिर्फ़ उत्तर प्रदेश और बिहार में ही शिया वक़्फ बोर्ड हैं।




