तिरुवनंतपुरम। केरल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज किया है। कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने जबरदस्त जीत हासिल करते हुए 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटें जीत लीं, जबकि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) महज 35 सीटों पर सिमट गया। वहीं NDA ने 3 सीटें जीतकर राज्य में अपनी सीमित लेकिन अहम मौजूदगी दर्ज कराई।
इस चुनाव में सबसे बड़ा संदेश एंटी-इनकंबेंसी का रहा। लगातार दो कार्यकाल तक सत्ता में रहने वाली LDF सरकार के खिलाफ जनता में नाराजगी साफ दिखाई दी। बेरोजगारी, महंगाई, प्रशासनिक विवाद और स्थानीय मुद्दों ने सरकार की राह मुश्किल कर दी। इसका फायदा कांग्रेस नीत UDF को मिला, जिसने जमीनी स्तर पर मजबूत अभियान चलाकर सत्ता में वापसी की।
चुनाव में पार्टीवार प्रदर्शन इस प्रकार रहा
इंडियन नेशनल कांग्रेस- 63 सीट
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग- 22 सीट
सीपीआई (मार्क्सवादी)- 26 सीट
भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी- 8 सीट
केरल कांग्रेस- 7 सीट
भारतीय जनता पार्टी- 3 सीट
आरएसपी- 3 सीट
अन्य- 8 सीट
इस प्रकार से कांग्रेस नीत UDF की कुल सीटें 102 रहीं, जबकि वाम नीत LDF को 35 सीटों से संतोष करना पड़ा। राज्य में कांग्रेस ने इस बार संगठनात्मक कमजोरी को काफी हद तक दूर किया। विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन और पार्टी नेतृत्व ने भ्रष्टाचार, शासन शैली और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया। मुस्लिम लीग और अन्य सहयोगी दलों के साथ बेहतर तालमेल ने UDF को लगभग पूरे राज्य में बढ़त दिलाई।
मुख्यमंत्री रहे पिनराई विजयन हालांकि अपनी सीट धर्माडम से जीतने में सफल रहे, लेकिन उनकी सरकार राज्यभर में जनसमर्थन बचाने में पूरी तरह से नाकाम रही। कई वरिष्ठ वाम नेताओं को करीबी मुकाबलों में हार का सामना करना पड़ा। ग्रामीण इलाकों में भी LDF का प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहा।
बीजेपी की बात करें तो वह सरकार बनाने की दौड़ में भले ही नहीं हो, लेकिन पार्टी ने 3 सीटें जीतकर यह संकेत जरूर दिया है कि वह धीरे-धीरे केरल में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी का वोट शेयर और कुछ क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन भविष्य की राजनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
केरल की राजनीति में लंबे समय से सत्ता UDF और LDF के बीच बदलती रही है। 2021 में इतिहास रचते हुए LDF लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटा था, लेकिन 2026 में मतदाताओं ने फिर सत्ता परिवर्तन की परंपरा को बहाल कर दिया। इस जनादेश को कांग्रेस के पुनरुत्थान और वाम मोर्चे के खिलाफ जनाक्रोश के रूप में देखा जा रहा है।




