सत्य प्रकाश
नक्सलवाद के खिलाफ अभियान को निर्णायक चरण में पहुंचाने का दावा करने के बाद केंद्र सरकार ने अब देश को ‘नशामुक्त भारत’ बनाने के लक्ष्य को मिशन मोड में आगे बढ़ाने की तैयारी तेज कर दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि मोदी सरकार 31 दिसंबर 2029 तक देश से मादक पदार्थों के कारोबार को उखाड़ फेंकने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है। इसके लिए जुलाई 2026 से जुलाई 2029 तक का तीन वर्षीय रोडमैप तैयार किया गया है। जून 2026 में जारी ‘विजन डॉक्यूमेंट ऑन ड्रग कंट्रोल 2026-2029’ इस अभियान की संस्थागत रूपरेखा तय करता है।
सरकार के सामने चुनौती सिर्फ अवैध मादक पदार्थों की तस्करी रोकने की नहीं है। मामला देश के युवाओं, सार्वजनिक स्वास्थ्य, संगठित अपराध, सीमापार तस्करी और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है और ऐसे में युवाओं को नशे से बचाना सरकार की नीतियों में एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में उभर रहा है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार, 2019 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण में देश में सात करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार के मादक पदार्थ संबंधी विकार से प्रभावित पाए गए थे। इनमें करीब 1.2 करोड़ बच्चे भी शामिल थे।
आंकड़ों के अनुसार भारत की लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और देश की औसत आयु करीब 29 वर्ष है। विभिन्न आयु वर्ग के आधार पर देश की 50% से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है। इसके अलावा 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के लोग कुल जनसंख्या का लगभग 27% हिस्सा हैं। दुनिया का हर पांचवां युवा भारत में रहता है और भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यह युवा आबादी एक ओर जहां भारत को एक बड़े उपभोक्ता बाजार में रुप में रेखांकित करती हैं, वहीं मादक पदार्थों की व्यापक खपत के तौर पर भी दर्शाती है।
सामाजिक तौर पर युवाओं को मादक पदार्थों के सेवन का आदी बनाना अपेक्षाकृत सरल होता है और देश के सीमांत क्षेत्र में इन पदार्थों का बढ़ता सेवन और प्रभाव स्पष्ट रुप से दिखायी दे रहा है। पंजाब और मिजोरम एवं मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में युवाओं की बड़ी आबादी मादक पदार्थों के प्रभाव में हैं। पंजाब विधानसभा चुनावों की तैयारियों में युवाओं में नशे की लत और इसके प्रभाव से उनके परिवारों को बचाना एक मुद्दा बन रहा है। मादक पदार्थों के अवैध कारोबार ने देश की अंदरुनी और बाहरी सुरक्षा को भी चुनौती दी है। विभिन्न जांच से पता चला है कि आतंकवाद, उग्रवाद, कट्टरवाद और नक्सलवाद के लिए धन उपलब्धता भी नशीले पदार्थों के माध्यम से होती है।
यही वजह है कि सरकार मादक पदार्थों के कारोबार को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय इसे सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक सवाल से जोड़ रही है। गृह मंत्रालय का कहना है कि नशीले पदार्थों के कारोबार से हासिल धन का संबंध आतंकवाद और अन्य संगठित आपराधिक गतिविधियों से भी हो सकता है। इस दृष्टिकोण के तहत अब कार्रवाई का फोकस केवल सीमा पर पकड़े जाने वाले नशीले पदार्थों तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि उस पूरे नेटवर्क को समझना और तोड़ना है जो उत्पादन, तस्करी, अंतरराज्यीय वितरण और स्थानीय बिक्री को जोड़ता है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2004 से 2014 के बीच लगभग 26 लाख किलोग्राम मादक पदार्थ जब्त किए गए, जिनकी अनुमानित कीमत करीब 40 हजार करोड़ रुपये थी। वहीं 2014 से 2026 के बीच 1.19 करोड़ किलोग्राम से अधिक मादक पदार्थ जब्त किए जाने और उनकी अनुमानित कीमत 1.89 लाख करोड़ रुपये होने का दावा सरकार ने किया है। यहां आंकड़ों का एक दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। अधिक जब्ती एक ओर प्रवर्तन एजेंसियों की सक्रियता का संकेत हो सकती है, लेकिन दूसरी ओर यह इस बात का भी संकेत है कि देश में मादक पदार्थों की तस्करी का नेटवर्क कितना बड़ा और जटिल है। इसलिए सरकार की नई रणनीति का केंद्रीय विचार ‘पकड़ो और नष्ट करो’ से आगे बढ़कर पूरे तंत्र को ध्वस्त करना है।
सीमा से स्थानीय बाजार तक नेटवर्क पर नजर
भारत की भौगोलिक स्थिति इस चुनौती को और जटिल बनाती है। सरकार जिस ‘डेथ ट्रायंगल’ और ‘डेथ क्रिसेंट’ का उल्लेख कर रही है, उनके जरिए भारत के आसपास के क्षेत्रों से मादक पदार्थों की तस्करी के खतरे को रेखांकित किया जाता है। दक्षिण-पूर्व एशिया का गोल्डन ट्रायंगल म्यांमार, लाओस और थाईलैंड से जुड़ा क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से अफीम और हेरोइन के अवैध कारोबार के लिए जाना जाता रहा है। दूसरी ओर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान से जुड़ा क्षेत्र भारत के पश्चिमी हिस्से के लिए अलग तरह की चुनौती पेश करता है।
सरकार के अनुसार, इन मार्गों से आने वाली तस्करी को रोकने के लिए सीमा सुरक्षा, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और मालवहन तंत्र में जोखिम आधारित निगरानी को मजबूत किया जा रहा है। सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारतीय तटरक्षक बल, सीमा शुल्क और राजस्व खुफिया निदेशालय जैसे संस्थानों की भूमिका इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण होगी। लेकिन समस्या सीमा पर खत्म नहीं होती।
किसी सीमा क्षेत्र में पकड़ी गई खेप का अंतिम गंतव्य देश के भीतर कोई दूसरा राज्य या जिला हो सकता है। इसी वजह से सरकार अब जिलों को भी अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर कार्रवाई की रणनीति बना रही है- ऐसे जिले जहां मादक पदार्थों का निर्माण या प्रवेश होता है, परिवहन गलियारों वाले जिले और उपभोग वाले जिले। इसका अर्थ यह है कि कार्रवाई का फोकस किसी एक बरामदगी या गिरफ्तारी के बजाय पूरे आपूर्ति तंत्र की कड़ियों को जोड़ने पर होगा।
चार स्तंभों पर टिका है तीन साल का मिशन मोड
‘विजन डॉक्यूमेंट 2026-2029’ में सरकार ने चार प्रमुख स्तंभ निर्धारित किए हैं। पहला है खुफिया और अभियान आधारित प्रवर्तन, दूसरा प्रीकर्सर रसायनों और सिंथेटिक ड्रग्स पर नियंत्रण, तीसरा मांग में कमी और नुकसान को कम करना, और चौथा क्षमता निर्माण एवं समन्वय। इन चार स्तंभों के तहत 25 घटक और 200 से अधिक कार्रवाई बिंदु तय किए गए हैं। सरकार के अनुसार अब जांच का दायरा डार्कनेट, एन्क्रिप्टेड संचार, क्रिप्टो आधारित लेन-देन और नए वितरण तरीकों तक बढ़ाया जा रहा है। यानी जिस तरह मादक पदार्थों का कारोबार तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है, उसी तरह जांच एजेंसियों को भी तकनीकी क्षमता से लैस करने की कोशिश है।
जांच की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी वित्तीय नेटवर्क है। सरकार की रणनीति में मादक पदार्थों के कारोबार से जुड़े धन प्रवाह की पहचान और अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई को भी महत्व दिया गया है। 2019 से जुलाई 2026 के बीच सरकार ने 93.33 लाख किलोग्राम मादक और मन:प्रभावी पदार्थ जब्त करने का आंकड़ा दिया है, जिसकी अनुमानित कीमत 1.53 लाख करोड़ रुपये बताई गई है। इसी अवधि में करीब 3,992 करोड़ रुपये की अवैध संपत्तियों को फ्रीज या जब्त करने और 128 अवैध प्रयोगशालाओं को ध्वस्त करने की जानकारी भी दी गई है।
सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, दोषसिद्धि तक पहुंचने की चुनौती
मादक पदार्थों के खिलाफ किसी भी अभियान की सफलता केवल बरामदगी और गिरफ्तारियों से नहीं मापी जा सकती। असली चुनौती जांच को अदालत में टिकाऊ अभियोजन और दोषसिद्धि तक पहुंचाने की है। इसी वजह से नई रणनीति में ‘जांच से दोषसिद्धि’ तक की पूरी प्रक्रिया को मजबूत करने पर जोर है। 2025 में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने 1,33,965 किलोग्राम मादक पदार्थ जब्त किए। इसी वर्ष 265 आरोपियों को 131 मामलों में दोषी ठहराए जाने और दोषसिद्धि दर करीब 67 प्रतिशत तक पहुंचने की जानकारी एनसीबी ने दी है।
आगे सरकार का जोर फॉरेंसिक रिपोर्ट को समयबद्ध करने, अभियोजन तंत्र के साथ बेहतर तालमेल और विदेशों में मौजूद भगोड़े आरोपियों को भारत वापस लाने पर भी है। सितंबर 2026 में गृह मंत्रालय ने कहा कि प्रत्येक राज्य में सुसज्जित एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स तैयार करने तथा मादक पदार्थों के नमूनों की फॉरेंसिक रिपोर्ट 30 दिन के भीतर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।
इलाज और पुनर्वास भी रणनीति का हिस्सा
नशे के खिलाफ लड़ाई का दूसरा पहलू मांग को कम करना है। यहां सिर्फ कानून लागू करने से समस्या का समाधान संभव नहीं है। नशे की गिरफ्त में आ चुके लोगों के लिए उपचार, परामर्श और पुनर्वास की व्यवस्था उतनी ही महत्वपूर्ण है। सरकार के मुताबिक ‘नशामुक्त भारत अभियान’ के तहत अब तक 25 करोड़ नागरिकों तक पहुंच बनाई गई है और उपचार एवं पुनर्वास के जरिए 5.70 लाख लोगों को नशे से बाहर निकालने का दावा किया गया है। सरकार ने नशामुक्ति केंद्रों की संख्या को बढ़ाकर 1,751 करने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान 334 केंद्रों से यह पांच गुना से अधिक विस्तार होगा और मार्च 2029 तक इसे पूरा करने की योजना है। बच्चों और महिलाओं के लिए विशेष सुविधाओं तथा प्रत्येक राज्य के कम से कम एक मेडिकल कॉलेज में समर्पित विभाग की योजना भी बताई गई है।
यहां सरकारी अभियान के साथ सामाजिक दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण हो जाता है। नशे की समस्या से जूझ रहे लोगों को केवल अपराधी के रूप में देखने के बजाय उपचार और पुनर्वास की जरूरत वाले व्यक्ति के रूप में देखना भी मांग में कमी की रणनीति का हिस्सा है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय का राष्ट्रीय कार्ययोजना इसी रोकथाम, उपचार, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन के बहुस्तरीय मॉडल पर आधारित है।
‘मानस’ से नागरिकों की भागीदारी
सरकार ने नागरिकों की भागीदारी के लिए ‘मानस’ यानी मादक पदार्थ निषेध सूचना केंद्र को भी अभियान का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया है। 1933 हेल्पलाइन के जरिए नागरिक मादक पदार्थों की तस्करी, भंडारण, निर्माण या अवैध खेती से संबंधित सूचना दे सकते हैं। इसके अलावा परामर्श और पुनर्वास संबंधी सहायता के लिए भी व्यवस्था उपलब्ध है। इसके साथ ही एनसीसी, एनएसएस और माय भारत के जरिए एक लाख ‘नशामुक्त भारत मित्र’ तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।
सितंबर 2026 तक सरकार के अनुसार 46,780 नशामुक्त भारत मित्र पंजीकृत हो चुके थे। इन्हें स्कूलों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों तक अभियान ले जाने के लिए इस्तेमाल करने की योजना है। सरकार अब इस अभियान को केवल प्रशासनिक कार्यक्रम के बजाय जनभागीदारी वाले अभियान में बदलने की कोशिश कर रही है। स्कूल और कॉलेजों को ‘पहली पंक्ति की रक्षा’ के रूप में देखा जा रहा है।
असली कसौटी लक्ष्य नहीं, जमीन पर परिणाम
नशामुक्त भारत 2029 का लक्ष्य निश्चित रूप से व्यापक है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी परीक्षा इसके क्रियान्वयन में होगी। 35 से अधिक मंत्रालयों, विभागों और एजेंसियों के साथ विचार-विमर्श के बाद तैयार किए गए रोडमैप में लक्ष्य, समयसीमा और समीक्षा की व्यवस्था की गई है। सितंबर 2026 में केंद्र ने राज्यों की एएनटीएफ के प्रमुखों के राष्ट्रीय सम्मेलन में भी इसी लक्ष्य को दोहराया।
अब चुनौती यह है कि केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय कितना प्रभावी रहता है, जांच एजेंसियां स्थानीय नेटवर्क तक कितनी गहराई से पहुंच पाती हैं, वित्तीय नेटवर्क को कितनी मजबूती से तोड़ा जाता है और इलाज तथा पुनर्वास की सुविधाएं वास्तविक जरूरतमंदों तक कितनी पहुंचती हैं।
मादक पदार्थों का कारोबार एक सीमापार और बहुस्तरीय अपराध तंत्र है। इसलिए किसी एक एजेंसी की कार्रवाई से इसका अंत संभव नहीं होगा। सीमा सुरक्षा से लेकर साइबर जांच, वित्तीय निगरानी, पुलिस, न्यायिक प्रक्रिया, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा संस्थानों और समाज- सभी को इस अभियान में अपनी भूमिका निभानी होगी।
सरकार ने 2029 की समय सीमा तय कर दी है। अब इस पूरे अभियान की वास्तविक कसौटी यही होगी कि तीन साल बाद आंकड़ों में सिर्फ जब्ती और गिरफ्तारियां बढ़ी हुई दिखाई देती हैं या तस्करी के स्रोत, वितरण तंत्र और नशे की मांग में भी टिकाऊ कमी दिखाई देती है। ‘नशामुक्त भारत’ का लक्ष्य जितना बड़ा है, उसे हासिल करने की चुनौती भी उतनी ही व्यापक है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)




