प्रशांत किशोर ने कैसे लिखी बांकीपुर विजय की पटकथा?

बांकीपुर उपचुनाव की जीत ने केवल भाजपा का तीन दशक पुराना किला नहीं ढहाया, बल्कि बिहार की राजनीति में तीसरे विकल्प की संभावना को भी मजबूत कर दिया है। प्रशांत किशोर की यह जीत रणनीति, संगठन और मुद्दों की राजनीति के नए समीकरण का संकेत देती है।

राधा रमण

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।

हिंदी के मशहूर कवि, लेखक, नाटककार और गजलकार दुष्यंत कुमार के गजल की ये पंक्तियां जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर पर फिलहाल तो सटीक लगती हैं। प्रशांत किशोर ने पटना के बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव में वह करिश्मा कर दिखाया, जिसकी बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को भी उम्मीद नहीं थी। बांकीपुर का जनादेश महज एक विधानसभा का चुनावी नतीजा नहीं माना जाना चाहिए। यह विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के इस्तीफे से खाली हुई वह सीट है, जिस पर नितिन नवीन और उनके स्वर्गीय पिता नवीन किशोर सिन्हा का पिछले 30 वर्षों से कब्जा था। प्रशांत किशोर ने महज 30 दिनों की मेहनत से यहां बड़ा उलटफेर कर दिया।

यह सब अचानक नहीं हुआ। बेशक, इसके लिए प्रशांत किशोर को अपना सौ प्रतिशत देना पड़ा। सनद रहे कि पानी सौ डिग्री के ताप पर उबलने पर ही वाष्प बनता है। भूलने वाली बात नहीं कि नौ महीने पहले बिहार विधानसभा के चुनाव में जनसुराज के 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो चुकी थी। महज दो उम्मीदवार ही अपनी जमानत बचा पाए थे। हालांकि तब भी जनसुराज को 3.4 फीसदी वोट जरूर मिले थे। किसी नयी-नवेली पार्टी के लिए यह कम नहीं है।

“बांकीपुर ने केवल भाजपा का 30 साल पुराना किला नहीं तोड़ा, बल्कि बिहार की राजनीति में यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या अब मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम राजद नहीं रहेगा?”

राजनीति के जानकार भी यह समझ नहीं सके। उधर, जनसुराज की करारी हार से पक्ष-विपक्ष दोनों खुश थे। चुनाव के दौरान सरकार ने महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये भेजकर आधी आबादी का वोट अपने पाले में कर लिया। साथ ही दोबारा सरकार में आने पर दो-दो लाख रुपये रोजगार के लिए देने का लुभावना वादा भी किया था। तब भी जनसुराज ने अपना कोर मुद्दा शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार और पलायन को ही बनाया था। आज भी जनसुराज से जुड़े लोग उन्हीं मुद्दों की बात करते हैं।

प्रशांत के फतह की कहानी पूरी फिल्मी है

2025 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद प्रशांत हताश होकर घर नहीं बैठे। वह पश्चिम चंपारण के भितिहरवा आश्रम पहुंचे, जहां से गांधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ नील की खेती करने वाले किसानों के लिए सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था। उन्होंने 24 घटे का मौन व्रत किया फिर कहा कि वह लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए बिहार में घर-घर तक जाएंगे। जनसुराज की लड़ाई किसी राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि बिहार बदलने की है। बिहार में खुशहाली लाना ही उनका ध्येय है। उन्होंने अपने जीवन का 10 साल बिहार के विकास के लिए समर्पित करने का फैसला किया है। उन्होंने दिल्ली का अपना आवास छोड़कर अपने 20 वर्षों की अर्जित कमाई का 90 फीसदी हिस्सा जनसुराज को दान कर दिया। कहा, आगे भी वह जो कमाएंगे, उसका 90 फीसदी जनसुराज का होगा। उन्होंने लोगों से भी कम से कम 1000 रुपये जनसुराज को दान करने की अपील की।

बाद के दिनों में लोगों ने देखा कि चाहे पटना में जहानाबाद की नीट छात्रा की दुष्कर्म के बाद हत्या का मामला हो, पटना के ही बंटी यादव की हत्या अथवा आरा के बेलौटी गांव के भारत भूषण तिवारी की हिरासत में हत्या, प्रशांत किशोर हर जगह पहुंचे और पीड़ितों के आंसू पोंछे। पटना में पिछले माह छात्रों पर हुए बर्बर लाठीचार्ज के खिलाफ उन्होंने हुंकार भरी। जबकि बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल की हार से इतने हताश हुए कि विधानसभा की बैठकों में भी कम ही जाते हैं। इसका सीधा लाभ बांकीपुर के उप चुनाव में प्रशांत किशोर को मिला। 2025 के विधानसभा चुनाव में जनसुराज के पास पेड वर्करों का भारी जमावड़ा था।

इस बार बांकीपुर में प्रशांत ने समर्पित कार्यकर्ताओं को साथ लिया। इनमें अधिकांश युवा थे जो अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहते थे। प्रशांत खुद मोहल्लावासियों के साथ देर रात तक बैठते थे। उन्होंने चुनाव में नीतीश कुमार की सक्रिय भागीदारी नहीं होने और भाजपा द्वारा नीतीश कुमार को दरकिनार करने का मुद्दा उठाया, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया। इस बीच, भाजपा के एक सांसद द्वारा यह कह देना कि बांकीपुर से भाजपा किसी कुत्ते-बिल्ली को भी कमल का निशान देकर चुनाव मैदान में उतार देगी तो वह जीत जाएगा। प्रशांत ने इस बयान को लपक लिया और खूब भुनाया। इसका उन्हें लाभ भी मिला। वह पूरे चुनाव मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर आक्रामक रहे। इससे लोगों को लगा कि अगर एक अकेला प्रशांत को विधानसभा में भेजा जाएगा तो वह सरकार की नाक में दम कर देगा, विपक्ष जी उठेगा।

बांकीपुर में भाजपा के अहंकार की हुई हार

अहंकार पतन का कारण होता है और बांकीपुर में भाजपा उसकी शिकार हो गई। भाजपा पर बांकीपुर में लगातार 30 वर्षों तक जीत का खुमार इस कदर चढ़ा कि वह जीती बाजी हार गई। देश के 72 प्रतिशत भू-भाग और 78 प्रतिशत आबादी पर शासन करने वाली भाजपा बांकीपुर में प्रत्याशी चयन में ही चूक कर बैठी। पहले जिस अभिषेक बंटी का नामांकन कराया, उसके पिता का नाम बहुचर्चित चारा घोटाला में आ जाने के कारण बदल दिया। हालांकि पार्टी की ओर से आखिर तक उम्मीदवार बदलने का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। अगर चारा घोटाला ही कारण था तो पूर्व मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र के बेटे नितीश मिश्र को लगातार मंत्री क्यों बनाया जा रहा है?

सूत्र तो यहां तक बता रहे हैं कि उम्मीदवार चयन में प्रदेश पार्टी की कोई राय ही नहीं ली गई थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी मर्जी से नीरज सिन्हा को खड़ाऊँ उम्मीदवार बना दिया था। फिर महज एक विधानसभा उप चुनाव के लिए 40 स्टार प्रचारकों की भारी-भरकम सूची जारी की गई। राज्य सरकार के मंत्री और विधायक अलग से मोहल्लों में डेरा डाले रहे। 6 हजार से ज्यादा बाहरी कार्यकर्ताओं को बांकीपुर में तैनात कर दिया गया। और तो और, स्वयं नितिन नवीन 11 दिनों तक पटना में गली-गली घूमे। बेशुमार धन खर्च किया गया। कुछ लोग नीतीश कुमार को चुनाव प्रचार से दूर किये जाने को भी भाजपा की हार का कारण मानते हैं। बाहुबली विधायक अनंत सिंह भी इसमें शामिल हैं।

लालू के राजद में घबराहट क्यों?

बिहार विधानसभा चुनाव में महज 25 सीटों पर सिमट जानेवाली राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में बांकीपुर के परिणाम से घबराहट है। सांसद मीसा भारती प्रशांत किशोर को भाजपा का असली उम्मीदवार बता रही हैं, जबकि उनकी बहन रोहिणी आचार्य प्रशांत किशोर को जमीन से जुड़ा नेता बताते हुए तेजस्वी पर तंज कस रही हैं। 30 जुलाई को जीत का दावा करने वाले तेजस्वी अब हकलाये फिर रहे हैं। बिहार में पिछले 35 वर्षों से लालू यादव राजनीति के केंद्र में रहे हैं। राज्य में लालू समर्थन और लालू विरोध की सियासत होती रही है। यह अलग बात है कि बढ़ती उम्र और बिगड़ती सेहत के कारण कुछ वर्षों से लालू महज तमाशबीन बने हुए हैं। पार्टी का सारा काम तेजस्वी ने संभाल लिया है। यहां तक कि उमीदवारों का चयन भी अब टीम तेजस्वी ही कर रही है। राजद के सिमटते जन समर्थन का यह बड़ा कारण है।

तो क्या बांकीपुर वही मोड़ साबित होगा, जैसा कभी दिल्ली में नई राजनीति के लिए 2013 का चुनाव साबित हुआ था? इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहने वाली। दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी तथा तमिलनाडु में टी. जोसेफ विजय के अभ्युदय के बाद इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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