सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारत की सीमा सुरक्षा

सीमा सुरक्षा अब केवल सेना या हथियारों तक सीमित नहीं रही। स्थानीय समुदाय, सांस्कृतिक पहचान, आधुनिक तकनीक और सरकारी नीतियों के समन्वय से भारत एक बहुस्तरीय सुरक्षा मॉडल विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

सत्य प्रकाश

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत की सीमाओं को केवल भूगोल की लकीरें नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई मानता है, जो सीमा सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए जनभागीदारी सुनिश्चित करता है। पारंपरिक राष्ट्रवाद जहां प्रशासनिक और सैन्य शक्ति पर केंद्रित होता है, वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद देश की साझी विरासत, इतिहास और सभ्यतागत पहचान को सुरक्षा का मुख्य आधार मानता है। राष्ट्रवाद की भावना देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करने का मुख्य आधार है, जो बाहरी और आंतरिक दोनों स्तरों पर घुसपैठ को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारतीय संदर्भ में, राष्ट्रवाद केवल एक राजनीतिक विचारधारा नहीं है, बल्कि यह सीमाओं को सुरक्षित रखने और देश के भीतर अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए एक मजबूत सुरक्षा चक्र तैयार करता है।

सीमा क्षेत्रों में स्थानीय आबादी की संस्कृति समान होने से उनमें एकता रहती है और समाज में सदभाव बना रहता है। समान संस्कृति होने से विदेशी और प्रवासी लोगों को पहचानना सरल होता है और सुरक्षा व्यवस्था बनी रहती है। घुसपैठ को रोकने में सीमावर्ती क्षेत्रों के स्थानीय नागरिक सुरक्षा बलों के ‘आंख और कान’ की तरह काम करते हैं। सैन्य बल और तकनीक कितनी भी आधुनिक हो, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना सीमाओं को पूरी तरह सुरक्षित रखना असंभव है। घुसपैठ, तस्करी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को नाकाम करने में स्थानीय आबादी त्वरित और सटीक जमीनी खुफिया जानकारी देती है। स्थानीय लोग अपने क्षेत्र के भूगोल, रास्तों और वहां के निवासियों से पूरी तरह वाकिफ होते हैं। इससे अजनबियों की पहचान सुनिश्चित होती है। सीमावर्ती गांवों में किसी भी नए या संदिग्ध व्यक्ति के आते ही स्थानीय लोगों को तुरंत पता चल जाता है। वे इसकी सूचना सीधे पुलिस को देते हैं। सुरक्षा बलों की नजरों से छिपे प्राकृतिक रास्तों, नदी-नालों या घने जंगलों की जानकारी स्थानीय लोगों को होती है। इन रास्तों पर होने वाली किसी भी संदिग्ध हलचल को वे तुरंत पकड़ लेते हैं। कई संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय नागरिकों को औपचारिक और अनौपचारिक रूप से सुरक्षा ग्रिड का हिस्सा बनाया गया है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा भारत की सीमा सुरक्षा को कई रणनीतियों और पहलों के माध्यम से सुदृढ़ कर रही है। सीमावर्ती गांवों को ‘पहला गांव’ मानना सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तहत सीमाओं को देश का ‘अंतिम छोर’ मानने की औपनिवेशिक मानसिकता को बदला गया है। भारत-चीन सीमा पर बसे गांवों को अब ‘देश का पहला गांव’ कहा जाता है। बुनियादी ढांचे सड़क, बिजली, इंटरनेट और पर्यटन को बढ़ावा देकर स्थानीय आबादी का पलायन रोका जा रहा है। यदि सीमावर्ती क्षेत्रों में नागरिक बसे रहेंगे, तो वे सुरक्षा बलों के लिए ‘आंख और कान’ का काम करते हैं।

वाइब्रेंट विलेजेस में सांस्कृतिक जुड़ाव और देशभक्ति को जोडा गया है। सुरक्षा केवल सेना के हथियारों से नहीं, बल्कि स्थानीय नागरिकों के मनोबल से मजबूत होती है। इसमें सांस्कृतिक समावेशन इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों और लद्दाख जैसे दूरदराज के सीमावर्ती क्षेत्रों के स्थानीय त्योहारों, भाषाओं और परंपराओं को राष्ट्रीय मुख्यधारा में गौरवपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। इससे अलगाववादी ताकतों और विदेशी दुष्प्रचार का प्रभाव समाप्त होता है। इन क्षेत्रों में राष्ट्रीय प्रतीकों की स्थापना की जा रही है। सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़े राष्ट्रीय ध्वज फहराना और देशभक्ति के कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय युवाओं में राष्ट्र प्रथम की भावना को जगाया जा रहा है, जिससे वे राष्ट्र विरोधी तत्वों के बहकावे में नहीं आएं। देश के आम नागरिकों को सीमाओं से जोड़ने के लिए ‘सीमा पर्यटन’ को एक अभियान का रूप दिया गया है।

लद्दाख में दुनिया की सबसे ऊंची सड़क उमलिंग ला, अरुणाचल प्रदेश का किबिथू और जैसलमेर की तनोट माता सीमा जैसे क्षेत्रों में आम नागरिकों की आवाजाही बढ़ाई गई है। जब देश के विभिन्न हिस्सों से लोग इन दुर्गम सीमाओं पर जाते हैं, तो इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, बल्कि वहां तैनात सैनिकों और स्थानीय लोगों का जुड़ाव शेष भारत से गहरा होता है। इससे धार्मिक और ऐतिहासिक संबंधों का पुनरुत्थान हो रहा है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अंतर्गत भारत अपनी सीमाओं के पार और सीमांत क्षेत्रों में ऐतिहासिक संबंधों को पुनर्जीवित कर रहा है। लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध मठों और सांस्कृतिक केंद्रों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। यह चीन द्वारा सीमा पार किए जा रहे सांस्कृतिक बदलावों के खिलाफ एक मजबूत ‘सॉफ्ट पावर’ और सुरक्षा कवच तैयार करता है।

जम्मू-कश्मीर और पंजाब के सीमावर्ती इलाकों में ‘विलेज डिफेंस ग्रुप्स’ सक्रिय हैं। इन्हें आत्मरक्षा और घुसपैठियों का मुकाबला करने के लिए बुनियादी हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता है। कठिन मौसम (जैसे भारी बर्फबारी या घने कोहरे) के दौरान स्थानीय युवा सुरक्षा बलों के साथ मिलकर या अपने स्तर पर गांवों की सुरक्षा के लिए पहरा देते हैं। आधुनिक समय में घुसपैठिए हथियारों, ड्रग्स और जाली नोटों की तस्करी के लिए ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। पंजाब और राजस्थान की सीमाओं पर स्थानीय किसान और ग्रामीण रात के समय ड्रोन की आवाज सुनते ही तुरंत सुरक्षा बलों को सतर्क करते हैं, जिससे कई ड्रोन मार गिराए जाते हैं और बड़ी साजिशें नाकाम होती हैं।

घुसपैठिए और तस्कर अक्सर स्थानीय युवाओं को पैसों का लालच देकर गाइड या कूरियर के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। जागरूक और राष्ट्रभक्त स्थानीय आबादी इन प्रलोभनों को ठुकराकर राष्ट्र विरोधी नेटवर्क को ध्वस्त कर देती है। कठिन और दुर्गम पहाड़ियों या दलदली इलाकों में ऑपरेशन्स के दौरान स्थानीय लोग सेना के सबसे बड़े मददगार बनते हैं। कारगिल युद्ध से लेकर हालिया एंटी-इन्फिल्ट्रेशन ऑपरेशन्स तक, स्थानीय कुलियों और गाइडों ने सुरक्षा बलों को सही रास्तों से रणनीतिक चोटियों तक पहुंचाने में मदद की है। कठिन परिस्थितियों में वे सुरक्षा बलों को आश्रय, भोजन और आपातकालीन जानकारियां उपलब्ध कराते हैं।

घुसपैठ रोकने में नागरिकता कानून सुरक्षा कवच का काम करता है, जबकि आधुनिक तकनीकी उपकरण जमीनी स्तर पर सीमाओं को अभेद्य बनाते हैं। यह दोनों मिलकर भारत की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को सुदृढ़ करने में पूरक भूमिका निभाते हैं।नागरिकता कानून सीधे तौर पर भौतिक सीमा को नहीं रोकता बल्कि यह घुसपैठियों के लिए भारत में अवैध रूप से बसने और नागरिकता हासिल करने के रास्तों को कानूनी रूप से बंद करता है। नागरिकता कानून के अंतर्गत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण 31 दिसंबर 2014 से पहले आए छह अल्पसंख्यक समुदायों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को नागरिकता देने का प्रावधान है। यह कानून उन आर्थिक या अन्य घुसपैठियों को स्पष्ट रूप से अलग करता है जो बिना किसी वैध दस्तावेज के देश में अवैध रूप से प्रवेश करते हैं।

घुसपैठिए अक्सर भारत में प्रवेश करने के बाद फर्जी पहचान पत्र जैसे आधार और राशन कार्ड बनवाकर देश के संसाधनों का दोहन करते हैं। नागरिकता संशोधन कानून के लागू होने से नागरिकता की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी हो गई है, जिससे अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान आसान हो जाती है और वे कानूनी लाभों से वंचित रह जाते हैं। यह कानून सुरक्षा एजेंसियों को देश के भीतर छिपे अवैध प्रवासियों को चिन्हित करने और विदेशी नागरिक अधिनियम के अंतर्गत उन पर कानूनी कार्रवाई करने के लिए एक स्पष्ट ढांचा प्रदान करता है।

राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा घुसपैठ रोकने के लिए चतुष्कोणीय सुरक्षा ग्रिड निर्मित किया गया है। देशभक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा की भावना के तहत, भारत ने पारंपरिक सीमा चौकियों की सुरक्षा प्रणाली से आगे बढ़कर एक एकीकृत ‘एकीकृत सुरक्षा ग्रिड’ तैयार किया है। स्मार्ट बॉर्डर दृष्टिकोण के अंतर्गत तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल निगरानी, एंटी-ड्रोन सिस्टम और स्मार्ट सेंसर तैनात किए जा रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुरक्षा बलों, राज्य सरकारों, जिला प्रशासनों और स्थानीय खुफिया नेटवर्क को एक साथ जोड़ा है ताकि जमीनी स्तर से लेकर उच्च स्तर तक घुसपैठ की हर सूचना तुरंत साझा हो सके।

अभेद्य सीमा बुनियादी ढांचा राष्ट्रवादी नीतियों के तहत सीमाओं को भौगोलिक रूप से पूरी तरह सुरक्षित करने के लिए भारी निवेश किया जा रहा है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर करीब 79 प्रतिशत से अधिक बाड़ लगाने का काम पूरा हो चुका है। इसके साथ ही, भारत-म्यांमार की 1,610 किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने और मुक्त आवागमन व्यवस्था को खत्म करने का काम तेजी से चल रहा है। कॉम्प्रीहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम से नदी और दलदली इलाकों में भी इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस की मदद से अवैध घुसपैठ पर कड़ी नजर रखी जा रही है।

जनसांख्यिकीय मिशन और पहचान सत्यापन पर जोर दिया जा रहा है। अवैध घुसपैठ के कारण सीमावर्ती और शहरी क्षेत्रों में हो रहे अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव को रोकने के लिए सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। घुसपैठिए फर्जी आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी के जरिए अवैध रूप से नागरिकता हासिल करने का प्रयास करते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए तकनीकी स्तर पर पहचान पत्रों की बायोमेट्रिक जांच कड़ी की गई है ताकि अवैध प्रवासियों को वोट बैंक बनने से रोका जा सके। ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ के माध्यम से सीमावर्ती गांवों में बुनियादी ढांचा, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के साधन पहुंचाए जा रहे हैं। सीमा पर रहने वाले स्थानीय समुदायों में राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया जा रहा है, जिससे वे देश की सुरक्षा के अग्रिम पहरेदार बन सकें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत सुरक्षा बलों को दें।

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में सीमांत जिला पुलिस अधीक्षक सम्मेलन-2026 में कहा कि मोदी सरकार, संबद्ध सीमा रक्षक बल, राज्य एवं ज़िला प्रशासन, भारत सरकार के संबंधित हितधारक तथा स्थानीय नागरिकों के परस्पर जुड़ाव के साथ एक मजबूत चतुष्कोणीय सुरक्षा ग्रिड का निर्माण कर रही है। इससे सुरक्षित सीमा, समृद्ध सीमांत और सजग समाज के साथ ही देश सुरक्षित हो सकता है। देश को घुसपैठिया मुक्त बनाने और घुसपैठ हो ही न सके, इसके लिए एक मजबूत तंत्र का निर्माण किया जा रहा है। जनसांख्यिकी परिवर्तन का अध्य्यन करने, उसमें असामान्य कारणों से हो रही वृद्धि को चिन्हित करने और भविष्य में इसे रोकने के उपाय सुझाने के लिए डेमोग्राफी मिशन की शुरूआत की है। उन्होंने कहा कि रूथलैस अप्रोच के साथ जनसांख्यिकी में असामान्य कारणों से हो रही वृद्धि को रोकना मोदी सरकार का संकल्प है। गृह मंत्री ने कहा कि सीमांत क्षेत्रों में हो रहे जनसंख्यिकी परिवर्तन का मूल कारण घुसपैठ है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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