नई दिल्ली। बांग्लादेश ने भारत पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल (BSF) रात का अंधेरा होने का इंतजार करता है, फिर सीमा पर लगी फ्लडलाइटें बंद कर कथित अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या प्रवासियों को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार धकेल देता है। बांग्लादेश का कहना है कि यह प्रक्रिया किसी भी औपचारिक प्रत्यावर्तन व्यवस्था का पालन किए बिना की जा रही है, जिससे बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष और बच्चे दोनों देशों के बीच स्थित ‘जीरो लाइन’ में फंस जा रहे हैं।
ढाका का यह आरोप ऐसे समय सामने आया है जब केंद्र की मोदी सरकार अवैध प्रवासियों के खिलाफ ‘डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट’ अभियान चला रही है। पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा सरकारें भी इस अभियान को तेज़ी से लागू कर रही हैं, जिससे दोनों देशों के संबंधों में नया तनाव पैदा हो गया है।
बीजीबी प्रमुख मोहम्मद सिद्दीकी ने क्या कहा?
बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने भारत की कथित ‘पुश-इन’ कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि इससे स्थापित प्रत्यावर्तन प्रक्रिया को दरकिनार किया जा रहा है। उनके मुताबिक, इस तरह की कार्रवाई से कई लोग ‘नो मैन्स लैंड’ यानी जीरो लाइन में फंस जाते हैं। बांग्लादेश लंबे समय से भारत को आगाह करता रहा है कि ऐसी एकतरफा कार्रवाई दोनों देशों के संबंधों को और अधिक नुकसान पहुंचा सकती है।
ढाका की चेतावनी; बढ़ सकता है तनाव
बांग्लादेश की गृह राज्य मंत्री शामा ओबैद इस्लाम ने कहा कि एकतरफा निर्वासन की कार्रवाई से दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य करने की कोशिशों को झटका लग सकता है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण का भी मुद्दा उठाया। हसीना 2024 में सत्ता से हटने के बाद भारत में रह रही हैं और ढाका लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है, लेकिन भारत ने अब तक इस पर सहमति नहीं दी है।
भारत ने ढाका के आरोपों को किया खारिज
भारत ने बांग्लादेश के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उसने 2,680 से अधिक मामलों में संबंधित लोगों की नागरिकता की पुष्टि के लिए बांग्लादेश से संपर्क किया था, लेकिन कई मामलों में पांच वर्ष से भी अधिक समय से सत्यापन लंबित है। एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी के अनुसार, निर्वासन की प्रक्रिया दोनों देशों के समन्वय से ही पूरी हो सकती है, लेकिन बांग्लादेश की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
भारतीय अधिकारियों का मानना है कि 2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद भारत की नीति अधिक सख्त हुई है। अधिकारियों के मुताबिक, हसीना के साथ करीबी संबंधों के कारण पहले भारत इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाता था, लेकिन नई राजनीतिक परिस्थितियों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी गई है।
बंगाल और असम में भी तेज हुआ अभियान
पश्चिम बंगाल में भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने हाल ही में दावा किया था कि 10,000 अवैध घुसपैठियों को बांग्लादेश वापस भेजा जा चुका है, जबकि 1,800 अन्य लोगों को 12 होल्डिंग सेंटरों में रखा गया है। वहीं, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ ‘युद्ध’ की घोषणा करते हुए इसे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा बताया है।
हालांकि हाल ही में नई दिल्ली में BSF और BGB के महानिदेशक स्तर की बैठक हुई थी, लेकिन इससे सीमा पर तनाव कम नहीं हुआ है। दूसरी ओर, म्यांमार से आए बड़ी संख्या में रोहिंग्या शरणार्थियों का बोझ उठा रहे बांग्लादेश का कहना है कि वह और अधिक प्रवासियों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।
मानवाधिकार संगठनों ने भी जताई चिंता
मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उपप्रमुख मीनाक्षी गांगुली ने भी भारत के निर्वासन अभियान की आलोचना की है। उनका कहना है कि इस अभियान का सबसे अधिक असर मुस्लिम समुदाय पर पड़ रहा है। हाल के महीनों में कई मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि इस अभियान के दौरान कुछ भारतीय मुस्लिम नागरिकों को भी कथित तौर पर गलत पहचान के आधार पर अवैध प्रवासी मान लिया गया, जिसके कारण उन्हें विस्थापन का सामना करना पड़ा।
कई मुद्दों पर बढ़ रहा है भारत-बांग्लादेश तनाव
भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो भारत की किसी भी पड़ोसी देश के साथ सबसे लंबी सीमा है। शेख हसीना के प्रत्यर्पण विवाद के अलावा तीस्ता नदी जल बंटवारा भी दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद का विषय बना हुआ है। ऐसे में अवैध प्रवासियों को लेकर चल रहा विवाद द्विपक्षीय संबंधों में एक नया तनाव पैदा करता दिखाई दे रहा है।




