महाराष्ट्र वो राज्य है जो खेती-किसानी में आत्मनिर्भर भारत के सपनों को हकीकत में बदलने का दम रखता है वहां की राजधानी मुम्बई एक शर्मनाक और झकझोर देने वाली विरोधाभास का गवाह बन रहा है। एक ओर, बीते तीन महीनों में लगभग 750 किसानों ने अपनी जान दे दी; वहीं दूसरी ओर राज्य के कृषि मंत्री माणिकराव कोकाटे विधानसभा के भीतर बैठकर मोबाइल पर रमी खेलते नज़र आते हैं।
ये दृश्य सिर्फ एक मंत्री की लापरवाही भर नहीं है, ये उस पूरी राजनीति की पोल खोलता है जो अन्नदाता किसानों के दुःख-दर्द से वर्षों से आंखें मूंदे बैठी है। वायरल वीडियो केवल मोबाइल पर एक खेल की तस्वीर नहीं, बल्कि उस राजनीतिक शून्यता का आईना है, जिसमें आम आदमी और खासकर किसान, सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गए हैं।
750 के करीब आत्महत्याएं, मतलब रोज़ औसतन 8 किसान महाराष्ट्र में अपनी जान दे रहे हैं। फसलें सूख रही हैं, उनका बीमा नहीं मिल रहा, कर्ज से गला घुट रहा है और इस सबके बीच अगर कृषि मंत्री विधानसभा जैसी संवेदनशील जगह पर बैठकर मोबाइल पर रमी खेलते दिखें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह महज एक मंत्री की गलती नहीं, बल्कि व्यवस्था की सामूहिक विफलता है। मंत्री तो केवल उस ढांचे का हिस्सा हैं जहां प्राथमिकता किसानों की ज़िंदगी नहीं, बल्कि मीडिया मैनेजमेंट, सत्ता संतुलन और दलगत राजनीति है।
NCP (SP) की सांसद सुप्रिया सुले और विधायक रोहित पवार ने जिस मुखरता से इस मुद्दे को उठाया, वह स्वाभाविक भी है और राजनीतिक रूप से जरूरी भी। सुले ने ठीक ही कहा है, “ऐसे गंभीर वक्त में कृषि मंत्री का सदन में बैठकर मोबाइल गेम खेलना शर्मनाक है।” यह शर्म सिर्फ मंत्री की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की है, जो किसानों की आवाज सुनने की बजाय मोबाइल की स्क्रीन पर ताश के पत्तों में उलझा है।
विधायक रोहित पवार का व्यंग्य तो और भी चुभने वाला है। वह कहते हैं- “कभी गरीब किसानों के खेतों में भी आ जाओ महाराज…” यह बयान केवल आक्रोश नहीं, एक अपील है सत्ता से, सत्ताधारियों के विवेक से और उस ज़िम्मेदारी से जिसे हम “जनसेवा” कहते हैं।
एक तरफ सरकार “डिजिटल इंडिया” की बात करती है और वहीं दूसरी तरफ उसके मंत्री डिजिटल रमी में मस्त हैं। लेकिन जब किसान डिजिटल फॉर्म भरता है बीमा के लिए तो सर्वर डाउन होता है। जब वो मदद की आस में सरकारी बाबू के चक्कर काटता है तो उसे ‘प्रक्रिया में है’ कहकर टाल दिया जाता है।
राजनीति में जब संवेदनहीनता जब सामान्य सी बात बन जाए तो लोकतंत्र का असली चेहरा धुंधला पड़ने लगता है। ध्यान रहे, किसानों की आत्महत्याएं कोई आंकड़ा नहीं हैं, ये उस तंत्र की असफलता की चीख हैं, जिसे हर बार चुनाव के वक़्त उम्मीदों से लाद दिया जाता है और फिर उपेक्षा के गड्ढे में धकेल दिया जाता है।
सुप्रिया सुले का कहना है कि वो इस मामले को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने उठाएंगी। पर बड़ा सवाल है: क्या मुख्यमंत्री जवाब देंगे? या फिर ये मामला भी बाकी विवादों की तरह “अनुशासनात्मक जांच” और “मामले की गंभीरता से समीक्षा” जैसे बयानों में गुम हो जाएगा?
यहां पर मुख्यमंत्री की चुप्पी राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति मानी जा रही है। जब सत्ता सहयोग पर टिकी हो तो नैतिकता अक्सर गठबंधन का पहला शिकार बनती है।
वो किसान जो कभी “अन्नदाता” कहलाता था, आज खुद के लिए दो वक़्त की रोटी नहीं जुटा पा रहा। जब उसे न्याय की उम्मीद होती है, तब उसका प्रतिनिधि जिसकी तनख्वाह उसी के टैक्स के पैसे से चलती है- रमी खेलते पकड़ा जाता है। क्या यही है “अमृतकाल”? क्या यही है “नया भारत”?
इस पूरी घटना ने ये साफ कर दिया है कि किसानों की समस्याएं संसद या विधानसभा की प्राथमिकता में नहीं हैं और उनकी आत्महत्याएं महज़ एक ‘साइड न्यूज’ बनकर रह गई हैं।
महाराष्ट्र की यह घटना चेतावनी है केवल उस मंत्री के लिए नहीं, बल्कि पूरी राजनीति के लिए। जनता अब आंखें मूंदकर विश्वास नहीं करेगी। अगर किसान आत्महत्या कर रहा है और सत्ता में बैठे लोग उसे देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं तो यकीन मानिए, ये चुप्पी बहुत जल्द एक बड़े जन-आक्रोश में बदल सकती है।
इसलिए सवाल सिर्फ मंत्री के इस्तीफे का नहीं है, सवाल है कि क्या हम किसानों की ज़िंदगी को राजनीति की पहली प्राथमिकता बना पाएंगे? अगर नहीं बना पाए तो सोचिए फिर क्या होगा?




