Dr. Manmohan Singh हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी…

हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी… 27 अगस्त, 2012 को संसद परिसर में यह शेर पढ़ने वाले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह हमेशा के लिए खामोश हो गए। मेडिकल बुलेटिन के मुताबिक, महान अर्थशास्त्री और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. मनमोहन सिंह ने 26 दिसंबर 2024 की रात 9 बजकर 51 मिनट पर दिल्ली के एम्स में अंतिम सांस ली। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 92 वर्षीय अपने नेता को श्रद्धांजलि देते हुए एक्स पर लिखा- मैंने अपना मार्गदर्शक और गुरु खो दिया है।

प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के तौर पर बड़े काम

1. उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की स्थापना करके भारत को 1991 के आर्थिक संकट से बचाना।

2. विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) 2005 का गठन जिसने आईटी कंपनियों के विकास को तेज गति दी।

3. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, जिसने सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता को बढ़ावा दिया।

4. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 2005, जो गरीबों को आजीविका, भरण-पोषण और रोजगार प्रदान करता है।

5. भारत-अमेरिका परमाणु समझौते 2008 पर हस्ताक्षर, जिसने भारत को सबसे मजबूत परमाणु देश में से एक बना दिया।

6. साल 2006-2007 में भारत ने 10.08% की उच्चतम सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि हासिल की। फिर 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी से बचाया।

7. शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 जिसका उद्देश्य सभी को निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना है।

8. अपने प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में 27 करोड़ भारतीयों को गरीबी से बाहर निकाला और भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तक पहुंचाया।

9. 3 जनवरी 2014 को डॉ. मनमोहन सिंह ने बतौर पीएम आखिरी प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और अपने जीते-जी प्रेस कांफ्रेस करने वाले आखिरी पीएम साबित हुए।

डॉ. मनमोहन सिंह की शख्सियत के कई पहलू
एक मंझे हुए अर्थशास्त्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह जब राजनेता बने, तो उनकी शख्सियत के कई पहलू सामने आए। 27 अगस्त 2012 की तारीख। संसद का मॉनसून सत्र चल रहा था। तब मनमोहन सरकार पर कोल ब्लॉक आवंटन में भ्रष्टाचार का आरोप लगा। तब डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर कैग की रिपोर्ट में अनियमितताओं के जो आरोप लगाए गए हैं वे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और सरासर बेबुनियाद हैं। लोकसभा में बयान देने के बाद उन्होंने संसद भवन के बाहर मीडिया में भी बयान दिया था। उन्होंने उनकी ‘खामोशी’ पर ताना कसने वालों को जवाब देते हुए एक शेर पढ़ा था, ‘हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी’…

यूएस प्रेसिडेंट बराक ओबामा ने जब की थी तारीफ
27 सितंबर, 2013 की तारीख ने डॉ. मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व व काबिलियत को कुछ अलग ही अंदाज में पेश कर गया जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उनकी तारीफ में कसीदे गढ़े थे। दरअसल, साल 2010 में टोरंटो में जी-20 शिखर सम्मेलन था। इसमें मनमोहन सिंह के साथ द्विपक्षीय बैठक से पहले ओबामा ने उनकी तारीफ की थी। तब ओबामा ने कहा था- मैं आपको बता सकता हूं कि यहां जी-20 में जब प्रधानमंत्री बोलते हैं तो लोग सुनते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें आर्थिक मुद्दों की गहरी जानकारी है। भारत के विश्व शक्ति के रूप में उभरने की बारीकियां उन्हें पता हैं। इसके बाद 27 सितंबर 2013 को वाशिंगटन के व्हाइट हाउस स्थित ओवल ऑफिस में मनमोहन सिंह और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा की मुलाकात हुई थी। इस बारे में बराक ओबामा ने कहा था- सभी क्षेत्रों में प्रधानमंत्री सिंह एक शानदार पार्टनर हैं। जब बराक ओबामा ने अपने राजनीतिक सफर पर ‘ए प्रॉमिस्ड लैंड’ किताब लिखी थी तो इसमें उन्होंने नवंबर 2010 की अपनी भारत यात्रा का करीब 1400 शब्दों में जिक्र किया था। इस दौरान मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले आखिरी प्रधानमंत्री!
3 जनवरी, 2014 को बतौर प्रधानमंत्री अपने आखिरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ परमाणु क़रार की घोषणा जरूर की थी लेकिन उनके सामने सवाल करने वाले 100 से ज्यादा पत्रकार-संपादकों की रूचि सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यूपीए सरकार में थी। उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉ. मनमोहन सिंह ने 62 अनस्क्रिप्टेड सवालों के जवाब दिए थे। तब मनमोहन सिंह ने खुद की आलोचना को लेकर कहा था कि उन्हें ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ कहा जाता है लेकिन ‘मीडिया की तुलना में इतिहास उनके प्रति अधिक उदार रहेगा।’

मेरा सार्वजनिक जीवन एक खुली किताब है
2014 लोकसभा चुनाव में यूपीए की हार के बाद डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने आखिरी संबोधन में कहा था- मुझे जो कुछ मिला है, इस देश से ही मिला है…10 साल पहले इस जिम्मेदारी को संभालते वक्त मैंने पूरी मेहनत से काम करने और सच्चाई के रास्ते पर चलने का निश्चय किया था। आज जब पद छोड़ने का वक्त है तब मुझे एहसास है कि ईश्वर के अंतिम निर्णय से पहले सभी चुने गए प्रतिनिधियों और सरकारों के काम पर जनता की अदालत भी फैसला करती है। जैसा मैंने कई बार कहा मेरा सार्वजनिक जीवन खुली किताब है। मैंने हमेशा अपनी पूरी क्षमता से अपने महान राष्ट्र की सेवा करने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री का पद छोड़ने के बाद भी आपके प्यार और मोहब्बत की याद मेरे जेहन में ताजा रहेगी। मुझे जो कुछ मिला है, इस देश से ही मिला है। एक ऐसा देश जिसने बंटवारे के कारण बेघर हुए एक बच्चे को इतने ऊंचे पद तक पहुंचा दिया। ये एक ऐसा कर्ज है जिसे मैं कभी अदा नहीं कर सकता। ये एक ऐसा सम्मान भी है जिस पर मुझे हमेशा गर्व रहेगा।

मंत्री से ठनी तो मिला था प्रमोशन
डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत (वर्तमान पाकिस्तान) के पंजाब के गाह गांव में 26 सितंबर, 1932 को हुआ था। उनकी माता का नाम अमृत कौर और पिता का नाम गुरुमुख सिंह था। देश के विभाजन के बाद सिंह का परिवार भारत चला आया। मनमोहन सिंह ने पंजाब यूनिवर्सिटी से 1952 में इकोनॉमिक्स में बैचलर और 1954 में मास्टर्स डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 1957 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और 1962 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद मनमोहन सिंह ने 1966-1969 के दौरान यूनाइटेड नेशंस के लिए काम किया। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से ऑफर मिलने के बाद वो देश आकर प्रोफेसर बन गए। मनमोहन सिंह का ब्यूरोक्रेटिक करियर उस वक्त शुरू हुआ जब ललित नारायण मिश्रा ने उन्हें कॉमर्स मिनिस्ट्री में बतौर एडवाइजर नौकरी दी। उस दौर में मनमोहन सिंह खुलेआम कहा करते थे कि विदेशी व्यापार के मुद्दों पर भारत में उनसे ज्यादा जानने वाला कोई नहीं है। एक बार उनके मंत्री ललित नारायण सिंह से उनकी ठन गई थी। बस क्या था। मनमोहन सिंह ने धमकी दे डाली कि वह दोबारा से दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में प्रोफेसर की अपनी नौकरी पर चले जाएंगे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सचिव पीएन हक्सर को इसकी भनक लगी तो उन्होंने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद ‘ऑफर’ कर दिया। इस तरह से मंत्री से लड़ाई उनके लिए प्रमोशन का तोहफा लेकर आई। 1970 और 1980 के दशक में भारत सरकार में मनमोहन सिंह अहम पदों पर रहे। 1972-76 तक चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर, 1982-85 तक रिजर्व बैंक के गवर्नर और 1985-87 तक प्लानिंग कमीशन के मुखिया रहे।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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