लोकसभा में हंगामे पर स्पीकर का सख्त संदेश; तख्तियां नहीं, तर्क लाइए

संसद के मानसून सत्र का आज यानी गुरुवार को चौथा दिन था। सुबह 11.00 बजे लोकसभा की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, विपक्षी सांसद बिहार वोटर वेरिफिकेशन मामले पर हंगामा करने लगे। कांग्रेस सहित कई विपक्षी सांसद वेल में आकर पोस्टर और तख्तियां लहराने लगे। इसपर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा- “तख्तियां लाकर अगर आप विरोध करेंगे, तो सदन नहीं चलेगा। ये आपके संस्कार नहीं हैं।”

इस तरह से हंगामे के बीच लोकसभा की कार्यवाही सिर्फ 12 मिनट ही चल सकी। लोकसभा अध्यक्ष ने सदन को शुक्रवार सुबह 11.00 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया। राज्यसभा की कार्यवाही सिर्फ 1:45 मिनट ही चल पाई।

दरअसल, बिहार में मतदाता सत्यापन (वोटर वेरिफिकेशन) को लेकर सामने आए आरोपों ने विपक्षी दलों को एकजुट कर दिया है। आरोप हैं कि एक राज्य विशेष में प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग कर चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में अनियमितता की जा रही है, जिसका उद्देश्य सत्तारूढ़ दल यानी भाजपा को चुनावी लाभ पहुंचाया जा सके। यह एक ऐसा मुद्दा है जो न सिर्फ चुनावी निष्पक्षता बल्कि लोकतंत्र की नींव से जुड़ा हुआ है और यही कारण है कि विपक्ष इसे सदन में उठा रहा है।

लोकसभा में विपक्षी दलों के हंगामे के बीच स्पीकर ओम बिरला का कांग्रेस सांसदों को इंगित यह बयान कि “ये आपके संस्कार नहीं हैं” को एक राजनीतिक संदेश के तौर पर भी पढ़ा जा सकता है। स्पीकर ओम बिड़ला का यह सख्त संदेश महज अनुशासन बनाए रखने की कोशिश नहीं, बल्कि कांग्रेस जैसी प्रमुख पार्टी को “अनुशासनहीनता” के कटघरे में खड़ा करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या तख्तियां लेकर विरोध करना लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा नहीं है? क्या संसदीय गरिमा के नाम पर विरोध की आवाज़ों को दबाने की कोशिश की जा रही है? इसमें कोई दो राय नहीं कि सदन में शांति और मर्यादा का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन विपक्ष के विरोध को कैसे संयमित किया जाए, यह सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है। उसे चाहिए कि नेता प्रतिपक्ष और लोकसभा अध्यक्ष के साथ बैठक कर मसले को शांतिपूर्ण हल निकाले।

लगातार बाधित होते सत्र, हंगामा और फिर स्थगन, यह कोई पहली बार तो हो नहीं रहा है, लेकिन यह भी सच है कि इससे नीति-निर्माण, विधायी प्रक्रिया और जनता के मुद्दों पर चर्चा बुरी तरह से प्रभावित तो होती ही है। 2025 के इस मानसून सत्र में अब तक कई घंटे केवल शोर-शराबे में जा चुके हैं। इससे न सिर्फ संसद की उत्पादकता, बल्कि जनता में लोकतंत्र के प्रति भरोसे पर भी असर पड़ता है।

बहरहाल, सदन में तख्तियां लाने पर पाबंदी एक संकेत है कि संसद में विरोध के स्वर को भी “विनियमित” किया जा रहा है। लेकिन सत्ता पक्ष को यह ध्यान रखना चाहिए कि लोकतंत्र में यदि विरोध के स्वर को विनियमित किया जाएगा तो यह संसद सिर्फ इमारत भर रह जाएगी। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सरकार संवेदनशीलता और विपक्ष सौम्यता को अपनाए ताकि संसद वाकई जन-प्रतिनिधित्व का मंच बन सके, न कि टकराव का अखाड़ा।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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