ऑल स्टोरी
SIR पर घिरा चुनाव आयोग, हलफनामे में दिया आधा-अधूरा जवाब
चुनाव आयोग के एसआईआर, ऑनलाइन फॉर्म-6 और ईसीआईनेट से जुड़े विवादों पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे ने कई सवालों को अनुत्तरित छोड़ दिया है। चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों, गोवा में मतदाता सूची से नाम हटने और पश्चिम बंगाल में अपीलों की प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे आयोग की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं।
बोट क्लब से बुराड़ी वाया जंतर-मंतर : छूमंतर होता लोकतंत्र
लोकतंत्र में जब मांगों और असहमति को लेकर उठने वाली आवाजों के लिए जगह सीमित होने लगे, तो सवाल सिर्फ विरोध-प्रदर्शन के आयोजन का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों का बन जाता है। दिल्ली में बोट क्लब से जंतर-मंतर और फिर बुराड़ी तक विरोध स्थलों का बदलता भूगोल इसी सवाल को सामने रखता है।
मणिपुर से जामिया तक सवालों के घेरे में मोदी का राजधर्म
मणिपुर में फिर हिंसा, अरुणाचल प्रदेश में सियांग परियोजना के खिलाफ उग्र प्रदर्शन और दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर आंदोलन। इन घटनाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काशी एयर शो में शामिल होना सरकार की प्राथमिकताओं और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर बहस खड़ी करता है।
लोकतंत्र को भरोसा चाहिए जनाब, बैरिकेड्स नहीं!
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के उत्तर-सत्य राजनीति संबंधी तर्कों के बीच चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों, एसआईआर में मतदाता सूची से नाम हटाने, मुख्य चुनाव आयुक्त के कानूनी संरक्षण और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर उठते सवालों की पड़ताल।
IDBI Bank Stake Sale : जनता के पैसे का पूरा हिसाब कहां है सरकार?
मोदी सरकार ने IDBI बैंक में सरकार और LIC की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी 52,878 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी है। सरकार का यह फैसला कई सवाल खड़े करता है- क्या बिक्री की कीमत में भविष्य की कमाई और सार्वजनिक बैंकिंग की जिम्मेदारियों का पूरा मूल्यांकन हुआ? सरकार को जनता के हित का हिसाब देना होगा।
जंतर-मंतर पर ताला : अब कहां गूंजेगी जन-विरोध की आवाज?
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का नोटिस जारी कर दिया है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या विरोध के लिए जगह बदलना महज प्रशासनिक फैसला है या इससे सत्ता के केंद्र तक जनता की आवाज पहुंचाने की क्षमता को कमजोर करना है?
फुले, पेरियार और अंबेडकर के विचारों से इतनी परेशानी क्यों?
जाति और पितृसत्ता की आलोचना को 'जहर' बताने वाली मुहिम ने सामाजिक न्याय और शिक्षा की स्वतंत्रता को आमने-सामने ला खड़ा किया है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में वामपंथी और अंबेडकरवादी विचारों की मौजूदगी को लेकर मांगी गई जानकारी के बहाने अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या सामाजिक असमानताओं पर सवाल उठाने वाले विचारों को ही संदेह के घेरे में रखा जा रहा है?
सवाल भारतीय चुनाव आयोग के इकबाल का है
चुनाव आयोग की निष्पक्षता और संस्थागत पारदर्शिता को लेकर बहस तेज है। दो चुनाव आयुक्तों द्वारा एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर दस महीनों में 14 बार आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट ने सवालों को नया आधार दिया है।
नक्सलवाद के बाद अब नशे पर प्रहार, 2029 तक ‘नशामुक्त भारत’ का लक्ष्य
केंद्र सरकार ने 2029 तक ‘नशामुक्त भारत’ बनाने के लिए तीन वर्षीय रोडमैप तैयार किया है। सरकार का जोर अब केवल मादक पदार्थों की जब्ती तक सीमित रहने के बजाय पूरे तस्करी नेटवर्क को ध्वस्त करने पर है।
ब्रिक्स की घोषणाएं और भारत की विदेश नीति का विरोधाभास
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का 140-बिंदुओं वाला घोषणा-पत्र वैश्विक दक्षिण की कई प्रमुख चिंताओं- बहुध्रुवीयता, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, जलवायु वित्त, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और एआई को सामने रखता है। लेकिन इसके साथ ब्रिक्स की अंतर्निहित सीमाएं और सदस्य देशों के हितों के अंतर्विरोध भी दिखाई देते हैं।

























